पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठों की पराजय के कारण

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  • अब्दाली के सैन्य बलों की संख्या मराठा सैन्य बलों से अधिक थी।
  • दिल्ली से संपर्क काट दिए जाने से मराठा शिविर में अकाल जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई थी।
  • बिना भेदभाव किए लूटमार करने की मराठा नीति से मुस्लिम और हिंदू शक्तियां जैसे जाट और राजपूतों ने भी मराठों का साथ छोड़ दिया था।
  • मराठा कमांडरों की आपसी ईस्या ने उनके पक्ष को कमजोर कर दिया।
  • अब्दाली की सेना कुशल संगठित और सुसज्जित थी। इसने ऊंटों पर घूमने वाले बंदूकों का प्रयोग कर मराठा सैन्य बलों में भय पैदा कर दिया।
  • अफगानों की शक्तिशाली सेना।
  • अहमद शाह अब्दाली का योग नेतृत्व।
  • मराठों में एकता की कमी।
  • छापामार युद्ध प्रणाली का परित्याग।

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पानीपत के तृतीय युद्ध का राजनीतिक महत्व

  • हालांकि युद्ध में मराठा मानवीय जीवन का भारी नुकसान हुआ, लेकिन मराठा शक्ति जल्द ही पहले की तरह से मजबूत हो गई। इसने लगभग 40 वर्षों तक अपने आपको इसी तरह स्थापित रखा, यद्यपि दूसरे आंग्ल मराठा युद्ध (1803) द्वारा इन पर ब्रिटिश सर्वोच्चता स्थापित नहीं हो गई।
  • महान मराठा सरदारों की मृत्यु के बाद, गलत महत्वाकांक्षा वाले रघुनाथराव जैसे लोगों के लिए रास्ता खुल गया।
  • इसने भारतीय राजनीति के क्षेत्र में मराठा प्रतिष्ठा को कम कर दिया।
  • मराठों का एक अखिल भारतीय साम्राज्य का सपना अविश्वसनीय रूप से समाप्त हो गया।

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