पंथनिरपेक्ष

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पंथ निरपेक्ष राज्य तीन तरह के राज्यों से अलग होता है। प्रथमतः वह भूतपूर्व सोवियत संघ जैसे उन साम्यवादी राज्यों से अलग होता है जो धर्म विरोधी होते हैं और अपने नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार नहीं देते। दूसरे वह वेटिकन सिटी जैसे उन धर्म 3 राज्यों से अलग होता है जिनमें धर्म का प्रमुख ही राज्य अध्यक्ष होता है तथा धार्मिक ग्रंथों को ही सविधान माना जाता है। तीसरे वह पाकिस्तान जैसे उधर में प्रभावित राज्यों से भी अलग होता है जो एक धर्म विशेष को राजकीय धर्म का दर्जा देते हैं तथा शेष धर्मों के नागरिकों को धार्मिक समानता की गारंटी नहीं देते हैं।

पंथनिरपेक्ष राज्य की सबसे प्रमुख पहचान यह है कि यह ना तो किसी धर्म को राजकीय धर्म का दर्जा देता है और ना ही अपने नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता से वंचित करता है। ऐसा राज्य प्रायः सभी धर्मों के साथ बराबर दूरी बनाकर चलता है तथा राजकीय कार्यों के भीतर धर्म के प्रभाव अस्वीकार करता है। ऐसे राज्यों में नागरिकों को व्यापक धार्मिक स्वाधीनता प्राप्त होती है जिसके तहत वे न सिर्फ अपने धर्म को मानने के लिए स्वतंत्र होते हैं बल्कि अपने धर्म का प्रचार प्रसार करने धर्मांतरण करने तथा किसी भी धर्म को ना मानने के लिए भी स्वतंत्र होते हैं। राज्य विभिन्न धर्मों के नागरिकों में इस आधार पर विरोध नहीं करता है कि उनके धर्म अलग-अलग हैं उसकी निगाह में सभी नागरिक बराबर होते हैं।

यद्यपि भारत के संविधान में पंथनिरपेक्ष शब्द को आपातकाल के दौरान 42 वें संविधान संशोधन 1976 के माध्यम से जोड़ा गया किंतु वास्तविक अर्थों में भारतीय स्वाधीनता प्राप्ति के बाद से लगातार पंथनिरपेक्ष रहा है। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान भारतीय नेतृत्व में सहमति बन गई थी कि भारतीय राज्य की प्रकृति पंथनिरपेक्ष होगी। यही कारण है कि भारत का कोई राजकीय धर्म नहीं है यहां धर्म के आधार पर नागरिकों में कोई भेदभाव नहीं किया जाता है। भारत की आपराधिक विधि तथा अधिकांश अन्य कानून सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करते हैं। इसके अलावा मूल अधिकारों के अंतर्गत अनुच्छेद 25 से 28 तक धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार अत्यंत व्यापक रूप में दिया गया है। उच्चतम न्यायालय ने भी पंथनिरपेक्षता को भारतीय संविधान का आधारभूत लक्षणों में निहित माना है।

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