आर्थिक संवृद्धि

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सन् 1960 से पहले तक आर्थिक संवृद्धि को आर्थिक विकास के रूप में देखा जाता था। इस पारंपरिक नजरिए में यह माना जाता था कि यदि किसी देश में सकल घरेलू उत्पाद के स्तर पर 5 से 7 प्रतिशत की वृद्धि हो रही हो एवम अर्थव्यवस्था का संरचनात्मक रूपांतरण कृषि से उद्योगों की तरफ हो तो यह माना जायेगा कि आर्थिक विकास हो रहा है जबकि किसी भी अर्थव्यवस्था के मूल्यांकन के नवीन दृष्टिकोण में अब आर्थिक संवृधि और आर्थिक विकास को अलग अलग माना जाता है।

आर्थिक संव्रद्धी शब्द का मात्रात्मक महत्व है। इसका प्रयोग आर्थिक विकास की प्रक्रिया के बाह्य स्वरूप को व्यक्त करने के लिए किया जाता है। संवृद्धि मापनीय एवम वस्तुगत होती है, तथा यह उत्पादन में होने वाले विस्तार को व्यक्त करती है। आर्थिक संव्रद्धि को उत्पादन की मात्रा में होने वेल निरंतर वृद्धि के द्वारा परिभाषित किया जा सकता है। इसे एक देश की वास्तविक आय में होने वाले परिवर्तन की दर द्वारा माला जा सकता है। हालांकि इसकी बेहतर माप वास्तविक प्रतिव्यक्ति आय में होने वाले परिवर्तन से है।

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