2.4 मूल्यह्रास (Depreciation)

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  1. उत्पादन प्रक्रिया में दूसरी वस्तुओं के उत्पादन में प्रयुक्त सभी मशीनों और उपकरणों में कुछ टूट-फूट होती रहती है आर्थिक बोलचाल की भाषा में ऐसी पूंजीगत वस्तुओं की वह हानि जिसका प्रत्येक अर्थव्यवस्था को टूट-फूट (Wear and tear) के रूप में भुगतना पड़ता है मूल्यह्रास कहलाता है।
  2. अर्थव्यवस्था में उत्पादित पूंजीगत वस्तुओं के एक भाग को इस टूट फूट के बदले में रखा जाना चाहिए अन्यथा एक राष्ट्र की उत्पादक क्षमता कम हो जाएगी। इस प्रकार रखे गए पूंजी को कैपिटल कम्संप्शन अलाउंस (Capital Consumption Allowance) कहते हैं।
  3. इस प्रकार ऐसे परिदृश्य में किसी फर्म में हुए निवेश व्यय को दो भागों में रखा जाता है। इसके 1 भाग का उत्पादन के लिए नई पूंजीगत वस्तुओं और मशीनरी को खरीदने में उपयोग किया जाता है इसे निवल निवेश(Net Investment) कहा जाता है, क्योंकि इससे फर्मों की उत्पादन क्षमता का विस्तार किया जा सकता है।
  4. इसके दूसरे भाग को उपयोग में लाई गई पूंजीगत वस्तुओं को प्रतिस्थापित करने या मौजूदा पूंजीगत वस्तुओं के रखरखाव के लिए व्यव किया जाता है। इस हेतु हुए व्यय को मूल्यह्रास व्यय (Depreciation Expenditure) कहा जाता है।
  5. किसी फर्म द्वारा इन दोनों राशियों के रूप में किए गए निवेश को सकल निवेश (Gross Investment) कहते हैं।
  6. यदि निर्बल निवेश सकारात्मक है तो यह राष्ट्र की उत्पादन क्षमता और आउटपुट को बढ़ाते हैं। इसे किसी छोटे फर्म या एक संयंत्र के स्तर पर आसानी से सत्यापित किया जा सकता है। अर्थात एक फर्म के लिए किसी भी वर्ष में स्थापित नई मशीनों की संख्या उन मशीनों की तुलना में अधिक होने चाहिए जो उस वर्ष के दौरान उपयोग में लाई गई है।
  7. सामान्यतः सरकार ही किसी अर्थव्यवस्था में मूल्यह्रास की दर तय करती है और इसकी घोषणा करती है कि कि संपत्ति में कितना मूल्यह्रास होगा तथा इसकी एक सूची भी प्रकाशित की जाती है अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों द्वारा इसका उपयोग विभिन्न प्रकार की परिसंपत्तियों में मूल्यह्रास के वास्तविक स्तर को निर्धारित करने में किया जाता है।

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