चीन के बीआरआई (BRI) निवेश में गिरावट

राज्य लोक सेवा आयोग संघ लोक सेवा आयोग

चीन स्थित थिंक टैंक की रिपोर्ट के अनुसार, चीन के बहुप्रचारित बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (Belt and Road Initiative- BRI) परियोजना के निवेश में वर्ष 2019 के बाद से 5% की गिरावट आई है।

  • निवेश में गिरावट का कारण असफल सौदे और कोविड-19 महामारी है।
  • अवसंरचना ऋण (Infrastructure Debt) और ऋण चूक (Loan Defaults) हेतु चीन अब अफ्रीका में परियोजनाओं के लिये नकदी नहीं दे रहा है।

प्रमुख बिंदु:-

BRI के बारे में:

  • यह 2013 में शुरू की गई एक मल्टी-अरब डॉलर की पहल है।
  • इसका उद्देश्य दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य एशिया, खाड़ी क्षेत्र, अफ्रीका और यूरोप को भूमि एवं समुद्री मार्गों के नेटवर्क से जोड़ना है।
  • इसका उद्देश्य विश्व में बड़ी बुनियादी ढांँचा परियोजनाओं को शुरू करना है जो बदले में चीन के वैश्विक प्रभाव को बढ़ाएगा।
  • रेलवे, बंदरगाह, राजमार्ग और अन्य बुनियादी ढांँचे जैसी बीआरआई परियोजनाओं में सहयोग करने के लिये 100 से अधिक देशों ने चीन के साथ समझौतों पर हस्ताक्षर किये हैं।
  • वर्ष 2000 से 2020 तक चीन ने अफ्रीकी देशों में 13,000 किलोमीटर से अधिक सड़क और रेलमार्ग, बड़े पैमाने पर 80 से अधिक विद्युत सुविधाओं के निर्माण में मदद की तथा 130 से अधिक चिकित्सा सुविधाओं, 45 खेल स्थलों व 170 से अधिक स्कूलों को वित्तपोषित किया है एवं अफ्रीकी संघ सम्मेलन केंद्र का निर्माण किया।

BRI के तहत गतिविधियाँ:

  • इसमें पाँच प्रकार की गतिविधियाँ शामिल हैं
  • नीति समन्वय, व्यापार संवर्द्धन, भौतिक संपर्क, रॅन्मिन्बी (चीन की मुद्रा) का अंतर्राष्ट्रीयकरण और पीपल-टू-पीपल संपर्क।

BRI के तहत मार्ग:

  • न्यू सिल्क रोड इकोनॉमिक बेल्ट: इसमें चीन के उत्तर में व्यापार और निवेश केंद्र शामिल हैं; जिसमें म्याँमार एवं भारत के माध्यम से यूंरेशिया तक पहुँच बनाना है।
  • मैरीटाइम सिल्क रोड (MSR): यह दक्षिण चीन सागर से शुरू होकर भारत-चीन, दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर जाती है और फिर हिंद महासागर के आसपास अफ्रीका एवं यूरोप तक पहुँचती है।

संबंधित चिंताएँ (भारत और विश्व के लिये):

भारत के सामरिक हितों में बाधा:

  • चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) और बलूचिस्तान से होकर गुज़रता है, दोनों ही क्षेत्र लंबे समय से विद्रोह के केंद्र हैं जहाँ भारत को आतंकवाद एवं सुरक्षा जोखिमों का सामना करना पड़ता है।
  • CPEC दक्षिण एशियाई क्षेत्र में भारत के रणनीतिक हितों को बाधित करेगा और कश्मीर विवाद मामले में पाकिस्तान को वैधता प्रदान करने में सहायक हो सकता है।
  • साथ ही CPEC को अफगानिस्तान तक विस्तारित करने का प्रयास अफगानिस्तान के आर्थिक, सुरक्षा और रणनीतिक साझेदार के रूप में भारत की स्थिति को कमज़ोर कर सकता है।
  • उपमहाद्वीप में चीन का सामरिक उदय: चीन द्वारा चीन-म्याँमार आर्थिक गलियारा (CMEC) और CPEC के साथ-साथ ‘चीन-नेपाल आर्थिक गलियारा’ (CNEC) भी विकसित किया जा रहा है जो तिब्बत को नेपाल से जोड़ेगा।
  • परियोजना का समापन बिंदु गंगा के मैदान की सीमाएँ होंगी।
  • इस प्रकार ये तीन गलियारे भारतीय उपमहाद्वीप में चीन के आर्थिक और रणनीतिक उदय को दर्शाते हैं।

पारदर्शिता की कमी:

  • बीआरआई समझौतों में पारदर्शिता की कमी और छोटे देशों पर चीन के बढ़ते कर्ज ने वैश्विक चिंताएँ बढ़ा दी हैं।
  • श्रीलंका द्वारा चीन को हंबनटोटा बंदरगाह 99 वर्ष के पट्टे पर देने के संबंध में बीआरआई के नकारात्मक पक्ष के बारे में चिंता व्यक्त की गई है और छोटे देशों में अरबों डॉलर की लागत वाली प्रमुख बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं पर ज़ोर दिया गया है।

बीआरआई के प्रतिपक्ष में :

  • B3W पहल: G7 देशों ने चीन के BRI का मुकाबला करने के लिये 47वें G7 शिखर सम्मेलन में ‘बिल्ड बैक बेटर वर्ल्ड (B3W) पहल’ का प्रस्ताव रखा।
  • इसका उद्देश्य विकासशील और कम आय वाले देशों में बुनियादी ढाँचे के निवेश घाटे को दूर करना है।
  • ब्लू डॉट नेटवर्क (BDN): यह अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया द्वारा गठित एक बहु-हितधारक पहल है, जो वैश्विक बुनियादी ढाँचे के विकास के लिये उच्च गुणवत्ता, विश्वसनीय मानकों को बढ़ावा देने तथा सरकारों, निजी क्षेत्र एवं नागरिक समाज को एक साथ लाने के लिये बनाई गई है।
  • BDN को औपचारिक रूप से नवंबर 2019 में बैंकॉक, थाईलैंड में इंडो-पैसिफिक बिज़नेस फोरम में घोषित किया गया था।
  • ग्लोबल गेटवे: बीआरआई के साथ प्रतिस्पर्द्धा करने के लिये यूरोपीय संघ ने हाल ही में ग्लोबल गेटवे नामक एक नई बुनियादी ढाँचा विकास योजना शुरू की।

आगे की राह :-

  • चीन के BRI का मुकाबला करने के लिये अधिक उन्नत देशों द्वारा वैकल्पिक परियोजनाएँ शुरू की जानी चाहिये जो मेज़बान/प्राप्तकर्ता देशों के हितों को ध्यान में रखते हुए प्रकृति में भी सहभागी हों।
  • भारत को अपने बुनियादी ढाँचे के निर्माण और उन्नयन के लिये आवश्यक होने पर जापान जैसे भागीदारों से मदद लेनी चाहिये और चीनी नेतृत्व वाले कनेक्टिविटी कॉरिडोर व बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं का विकल्प बनाना चाहिये क्योंकि दक्षिण एशिया और हिंद महासागर में अकेले कार्य करने की भारत की क्षमता सीमित है।
  • भारत के लिये अपने पड़ोसियों को वैकल्पिक कनेक्टिविटी व्यवस्था प्रदान करने हेतु इस क्षेत्र में अपने भागीदारों के साथ काम करना महत्त्वपूर्ण है।
  • विदेश नीति के प्रभाव को बढ़ाने के लिये कनेक्टिविटी को एक उपकरण के रूप में देखा जा रहा है।

स्रोत: बिज़नेस स्टैण्डर्ड

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