ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन संवैधानिक विकास (1773-1858)

Polity संघ लोक सेवा आयोग

भारत में कंपनी का शासन बंगाल, बिहार और उड़ीसा से आरंभ हुआ। 1764 में बक्सर के युद्ध के पश्चात उन्होंने मुगल बादशाह से इन सबों की दीवानी प्राप्त की और क्लाइव ने इन सबों में द्वैध शासन (Dual Government) स्थापित किया। इस शासन से सबों की स्थिति के साथ-साथ कंपनी की भी दयनीय स्थिति हो गई, जिसके कारण कंपनी को अंग्रेज सरकार से कर्ज मांगना पड़ा। सन् 1772 में तो आर्थिक अस्थिरता इतनी बढ़ गई की वह दिवालिया होने की स्थिति में आ गई। 26 जनवरी सन् 1772 ई को ब्रिटिश संसद ने कंपनी के विविध कार्यों की जांच के लिए एक प्रवर समिति तथा गुप्त समिति नियुक्त की। दोनो समितियों ने जांच करके अपनी-अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जैसा कि अपेक्षा थी रिपोर्ट अत्यधिक खेदजनक थी। अतः संसद ने दो अधिनियम पारित किए, एक के द्वारा कंपनी को व्याज पर कर्ज तो दे दिया गया परंतु साथ ही दूसरे अधिनियम के द्वारा भारत में कंपनी के शासन में सुधार हेतु 1773 ई में एक कानून भी बनाया गया जिसे रेग्यूलेटिंग एक्ट पुकारा गया।

1773 का रेग्यूलेटिंग एक्ट (The Regulating Act, 1773) :

तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री ‘लॉर्ड नॉर्थ’ द्वारा गठित गुप्त समिति की सिफारिश पर इस एक्ट द्वारा कंपनी के प्रशासन में परिवर्तन किया गया। इस अधिनियम ने कंपनी के शासन के लिए पहली बार लिखित संविधान प्रस्तुत किया और सुनिश्चित शासन पद्धति का श्रीगणेश किया। रेग्यूलेटिंग एक्ट का प्रमुख लक्ष्य भारत तथा इंग्लैंड स्थित कंपनी में व्याप्त भ्रष्टाचार एवम कुप्रशासन में सुधार लाना था।

प्रावधान :

(i) इस अधिनियम के द्वारा बंगाल के गवर्नर को अब बंगाल का “गवर्नल जनरल” कहा जाने लगा और उसे सहायता देने के लिए एक चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया। पहली गठित परिषद के निम्नलिखित सदस्य थे-

  • जॉन क्लेवरिंग
  • जॉर्ज मानसन
  • फिलिप फ्रांसिस
  • रिचर्ड बारवेल

(ii) इसके द्वारा मद्रास एवम बंबई के गवर्नर, बंगाल के गवर्नर जनरल के अधीन हो गए, जबकि पहले सभी प्रेसिडेंसियों के गर्वनल स्वतंत्र थे।

(iii) इस अधिनियम के अंतर्गत कलकत्ता में 1774 में एक उच्चतम न्यायालय की स्थापना की गई, जिसमे एक मुख्य न्यायाधीश तथा तीन अन्य न्यायाधीश थे।

सर एलिजाह इम्पे इसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश थे तथा तीन अन्य न्यायाधीश – (i) चैंबर्स, (ii) लिमेंस्टर, (iii) हाइड थे।

इस कोर्ट के निर्णयों को केवल लंदन की प्रिवी काउंसिल में ही चुनौती दी जा सकती थी।

(iv) बोर्ड ऑफ डायरेक्टर को और अधिक उत्तरदाई बनाने के लिए ब्रिटिश सरकार को भारतीय मामलों की रिपोर्ट देने को कहा गया।

(v) इसके तहत कंपनी के कर्मचारियों को निजी व्यापार करने व भारतीयों से उपहार लेना प्रतिबंधित कर दिया गया।

(vi) बोर्ड ऑफ डायरेक्टर की कार्यविधि एक वर्ष के स्थान पर चार वर्ष कर दी

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