मूल्यों के प्रकार

Ethics संघ लोक सेवा आयोग

मानवीय मूल्यों को प्रमुखता दो भागो में बांटा जा सकता है –

  1. उद्देश्य की दृष्टि से : इस दृष्टि से मानव मूल्य ‘ साध्य ‘ और ‘ साधन ‘ दो उपवर्गों में विभाजित होते हैं।

साध्य मूल्य वे मूल्य है जिन्हे हम पाना चाहते है। जैसे शांति, संतोष, न्याय, स्वतंत्रता, समानता, ज्ञान आदि।

साधन मूल्य वे है जिनके माध्यम से हम साध्य मूल्यों तक पहुंच सकते हैं। जैसे – साहस, धैर्य, ईमानदारी, विनम्रता, उत्तरदायित्व आदि।

2. दृष्टिकोण की दृष्टि से : दृष्टिकोण की दृष्टि से भी मूल्यों को सकारात्मक और नकारात्मक दो उपवर्गों में बांटा जा सकता है।

सकारात्मक मूल्य ऐसे मूल्य है जिनके होने का महत्व दिया जाता है। जैसे अहिंसा, शांति, विद्वेष, अन्याय आदि।

मूल्यों के विकास में परिवार की भूमिका :

मूल्यों के विकास में परिवार वह पहली सीढ़ी है जिस पर चढ़कर मानवीयता के लक्ष्य को पाना आसान लगता है। इसलिए परिवार कब, कैसे, कितना और किस प्रकार के मूल्यों को देना चाहता है यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है।

6 वर्ष तक की आयु एक ऐसा पायदान है जब बच्चा दूसरों के आचरण से सबसे अधिक प्रभावित होता है इसलिए प्राथमिक स्तर पर मूल्य इसी उम्र में निर्धारित होते है। हालांकि बाद में भी मूल्य विकसित होते है लेकिन प्रभाव का स्तर धीरे-धीरे कम होता जाता है।

प्रशिक्षण, प्रोत्साहन, निंदा, दंड कुछ ऐसे उपकरण हैं जिनसे ये मूल्य विकसित किए जा सकते हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि परिवार एकल है या संयुक्त। संभव है एकल परिवार से वैयक्तिक होने का मूल्य प्राप्त हो और संयुक्त परिवार से साथ रहने का। यह भी संभव है कि संयुक्त परिवार यदि ‘पितृसत्तात्मक’ है तो इस बात से स्त्रियों के प्रति कम सम्मान का मूल्य प्राप्त हो।

परिवार का शैक्षणिक स्तर तथा आर्थिक स्तर भी मूल्यों की पृष्ठभूमि तय करने में सहायक होते हैं।

मूल्यों के विकास में समाज की भूमिका :

समाज की असली भूमिका वैसे तो विद्यालय जाने के साथ शुरू होती है किंतु उससे पूर्व 6 वर्ष तक समाज और परिवार मूल्य विकास में बराबर भागीदार होते है।

किशोरावस्था एक ऐसा पड़ाव है जब समाज और परिवार का दवाब सर्वाधिक होता है। आरंभ में मूल्यों का विकास जाम होता है लेकिन समाज से ज्यों-ज्यों संपर्क बढ़ता है, विकास भी उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। मीडिया, खुद पर्यवेक्षी हो जाना, सामाजिक समूहों से वार्तालाप, सह-शिक्षा विद्यालय आदि से समाज के नैतिक मानदंड, सामाजिक गतिशीलता, रूढ़ी, परिवर्तन जैसे विचार का प्रभाव पड़ता है। विभिन्न धर्मों, जातियों और क्षेत्रों के लोगो के साथ धैर्य, सहिष्णुता जैसे मूल्यों को विकसित करने में सहायक होते हैं।

ध्यातव्य है कि सामाजिक प्रभाव अंतरक्रिया की मात्रा पर निर्भर करता है जो जितना सामाजिक होगा इस पर समाज का उतना ही प्रभाव पड़ेगा।

मूल्यों के विकास में शिक्षण संस्थानों की भूमिका :

शिक्षण संस्थान दो स्तरों पर मूल्य विकास में योगदान देते हैं – आधारभूत शिक्षा के स्तर पर तथा उच्च शिक्षा के स्तर पर।

आधारभूत मूल्यों का प्रभाव ज्यादा होता है जबकि उच्च शिक्षण संस्थान प्रायोगिक मूल्य का विकास कर पाते है। व्यक्तित्व परिवर्तन की संभावना उच्च स्तर ज्यादा होती है

विभिन्न विचारधाराओं के संपर्क में आने का क्रम भी उच्च शिक्षण संस्थानों से ही शुरू होता है, जो मूल्यों को प्रभावित करते है। जैसे मार्क्सवादी विचार से संपर्क में आने से वर्ग संघर्ष को समझना आदि।

विभिन्न पाठ्यक्रमों द्वारा स्वतंत्रता, समानता, अहिंसा, नैतिक शिक्षा का प्रभाव पड़ना। उदाहरण के लिए, इतिहास के पाठ्यक्रम यदि गांधी जी अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना या सत्य, अहिंसा का पाठ प्राथमिक और उच्च शिक्षण संस्थान में पढ़ाया जाए तो इसका प्रभाव मूल्य अच्छा होता है

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