मुद्रास्फीति के प्रकार( कारण के आधार पर)

Indian economy संघ लोक सेवा आयोग

3. संरचनात्मक मुद्रास्फीति (Structural Inflation)

यह किसी भी अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक संरचनाओं के कारण उत्पन्न होती है। उदाहरण स्वरूप – यदि परिवहन की सुविधाएं अथवा भंडारण की व्यवस्था में कमी हो। संरचनात्मक मुद्रास्फीति जमाखोरी, कालाबाजारी एवम व्यवसायी समूहीकरण के कारण ही उत्पन्न होती है।

जमाखोरी(Hoarding) वह प्रक्रिया है जिसमे एक विक्रेता अथवा बिचौलिया किसी उत्पाद को उसके उत्पादक से ज्यादा मात्रा में खरीदकर बाजार में न बेचकर लंबे समय तक उसका भंडारण कर लेता है। इसके कारण बाजार में उस वस्तु की कृत्रिम कमी उत्पन हो जाती है। तत्पश्चात उस वस्तु को बाजार में उच्च दर में बेचा जाता है।

जमाखोरी की ही तरह व्यवसायी समूहीकरण भी एक गैर कानूनी क्रिया है। इस प्रक्रिया में किसी वस्तु के उत्पादक अथवा सेवा प्रदान करने वाली कंपनियां प्रतिस्पर्धा को दर किनार कर सामूहिक रूप से अपने उत्पाद का मूल्य बढ़ा देते है। इस कारण से उपभोक्ता को ज्यादा मूल्य अदा करना होता है।

भारत में तीनों ही प्रकार की मुद्रास्फीति साथ उपस्थित है। चूंकि भारत एक विकासशील देश है यहां रोजगार के अवसर निरंतर उत्पन्न हो रहे है। इसके कारण मांग निरंतर कायम रहती है। लोगों की आय भी निरंतर बढ़ रही है। कालेधन के कारण भी मांग निरंतर उपस्थित है। इन सभी कारणों से मांग जनित मांग जनित मुद्रास्फीति उत्पन्न होती है। भारत कच्चे माल के उत्पादन में आत्म निर्भर नही है। इसके कारण किसी भी प्रकार के अंतर्राष्ट्रीय समस्या से कच्चे माल के मूल्य में वृद्धि हो जाती है। इसके कारण लागत जनित मुद्रास्फीति उत्पन्न होती है।

भारत में सभी संरचनात्मक समस्याएं उपस्थित है।परिवहन की सुविधाओं के माध्यम से देश के विभिन्न क्षेत्रों को अब तक पूर्णतः जोड़ा नहीं जा सका है। भंडारण की सुविधाएं उचित नहीं है। भारत में कुल उत्पादित फलों एवम सब्जियों में से भंडारण की सुविधा में कमी के कारण 40% नष्ट हो जाते है। भारत जमाखोरी, कालाबाजारी एवम व्यवसायी समूहीकरण इत्यादि की समस्या से भी ग्रसित है। यह सभी समस्याएं संरचनात्मक मुद्रास्फीति को जन्म देती है।

भारत में मुद्रास्फीति के नियंत्रण की जिम्मेदारी RBI की है। परन्तु RBI मात्र मांग जनित मुद्रास्फीति को ही नियंत्रित कर सकती है। मांग जनित मुद्रास्फीति को भी RBI पूर्णतः नियंत्रित नही कर सकती है। अपने मौद्रिक नीतियों के माध्यम से RBI बैंकिंग व्यवस्था में मुद्रा के प्रवाह को कम कर सकती है एवम मांग को नीचे ला सकती है परंतु अर्थव्यवस्था में उपस्थित कालेधन पर RBI का नियंत्रण नहीं है। यदि RBI तरलता ( मुद्रा का प्रवाह) को नियंत्रित करती है परंतु सरकार सार्वजनिक व्यय को बढ़ा देती है तब ऐसे में RBI के प्रयासों का प्रभाव नही रह जाता है। RBI लागत जनित मुद्रास्फीति को नियंत्रित नही कर सकती है। यह संरचनात्मक मुद्रास्फीति को भी नियंत्रित नही कर सकती है। अतः मुद्रास्फीति के नियंत्रण के उद्देश्य से RBI, भारत सरकार एवम राज्य सरकारों के सम्मिलित प्रयास के आवश्यक होगी।

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