भारत परिषद अधिनियम 1861 (The Indian council Act, 1861)

Polity संघ लोक सेवा आयोग

1861 का यह कानून भारत के संवैधानिक विकास में एक महत्वपूर्ण कदम था। इस कानून से अंग्रेजों की वह नीति आरंभ हुई जिसे सहयोग की नीति ( Policy of Association) या उदार निरंकुशता (Benevolent Despotism) का नाम दिया गया क्योंकि इसके द्वारा सर्वप्रथम भारतीयों को शासन में सम्मिलित करने का प्रयत्न किया गया था। 1858 ई. के कानून द्वारा भारत के शासन में चूंकि कोई परिवर्तन नहीं किया गया था, अतएव तीन वर्ष पश्चात 1861 के अधिनियम से उन कमियों को दूर करने का प्रयास किया गया।

प्रावधान:

  1. इस अधिनियम के अंतर्गत लॉर्ड कैनिंग ने पहली बार भारत में विभागीय प्रणाली (Portfolio System) की शुरुआत की। इसमें भिन्न-भिन्न सदस्यों को अलग-अलग विभाग सौंप कर एक प्रकार से मंत्रिमंडल व्यवस्था की नींव डाली गई।
  2. वायसराय काउंसिल की सदस्य संख्या 4 से बढ़ाकर 5 कर दी गई। इस पांचवे सदस्य को विधि का ज्ञान होना अनिवार्य था।
  3. केंद्रीय विधानपरिषद की संख्या 6 से 12 तक के मध्य निर्धारित की गई ये सदस्य 2 वर्षों के लिए वायसराय द्वारा नियुक्त होते थे।
  4. वायसराय को अध्यादेश जारी करने का अधिकार दिया गया और इसके लिए केंद्रीय विधानपरिषद की सलाह की आवश्यकता नहीं थी किंतु अध्यादेश की अधिकतम अवधि 6 माह थी।
  5. इस एक्ट के द्वारा पहली बार “विकेंद्रीकरण व्यवस्था” अपनाई गई तथा मद्रास और बंबई प्रेसिडेंसियों को कुछ मामलों मुद्रा, वित्त, ऋण आदि के मामलों में कानून बनाने का अधिकार दिया गया।
  6. 1861 के एक्ट में वायसराय को यह अधिकार दिया गया कि वह बंगाल, उत्तरपश्चिमी प्रांत उत्तरप्रदेश तथा पंजाब में भी विधानपरिषदों की स्थापना कर सकता है।

नोट:- भारत में लॉर्ड रिपन को “विकेंद्रीकरण का पिता” कहा जाता है।

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