1784 का पिट्स इंडिया एक्ट ( Pitt’s India Act of 1784)

Indian constitution संघ लोक सेवा आयोग

एक्ट ऑफ सेटलमेंट, 1781 के पारित होने के बाद भी कंपनी के प्रबंधन में सुधार न होने के कारण 1783 में फॉक्स ने कुप्रशासन को समाप्त करने के लिए एक विधेयक संसद में प्रस्तुत किया, जिसमे दो पृथक निकाय बनाने का सुझाव दिया गया –

  1. सात आयुक्तों का बोर्ड
  2. उपनिदेशकों का बोर्ड

यह विधेयक हाउस ऑफ कॉमन्स में पारित हो गया किंतु यह हाउस ऑफ लॉर्ड्स में पारित न हो सका। फलतः फॉक्स और नॉर्थ की मिली-जुली सरकार को त्यागपत्र देना पड़ा। यह पहला और अंतिम मामला था जब अंग्रेजी सरकार को भारत से संबंधित किसी मामले में त्यागपत्र देना पड़ा। मई 1784 ई के नए चुनावों में यंगर पिट बहुमत से प्रधानमंत्री बना और उसने जुलाई 1784 में अपना विधेयक प्रस्तुत किया जो अगस्त 1784 में पास हो गया। इसे पिट्स इंडिया एक्ट कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य रेगुलेटिंग एक्ट के दोषों को दूर करना था। इस अधिनियम के प्रमुख तथ्य निम्नलिखित थे –

  1. इस अधिनियम द्वारा कंपनी की व्यापारिक एवम राजनैतिक गतिविधियों को अलग-अलग कर दिया गया। बोर्ड ऑफ कंट्रोल कंपनी को राजनैतिक गतिविधियों पर स्थापित किया गया था जिसमे 6 सदस्य होते थे। कंपनी की व्यापारिक गतिविधियों के लिए बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स का गठन किया गया। इस प्रकार बंगाल में एक छत्र शासन व्यवस्था स्थापित हुआ।
  2. गवर्नर जनरल परिषद की सदस्यों की संख्या 4 से घटाकर 3 कर दी गई।
  3. गवर्नर जनरल भारतीय राजाओं के साथ कोई संधि या युद्ध बोर्ड ऑफ डायरेक्टर की अनुमति से ही कर सकता था।

निष्कर्ष : 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट का संवैधानिक विकास की दृष्टि से बहुत महत्व है। भारतीय प्रशासन पर इंग्लैंड सरकार का निश्चित अधिकार हो गया। बोर्ड ऑफ कंट्रोल का अध्यक्ष मंत्रिमंडल का एक सदस्य होता था। इस प्रकार यह वह प्रणाली स्थापित हो गई जो परिवर्तनों के साथ 1947 ई. तक चलती रही।

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