यूनिट -1 संविधान का निर्माण एवम दर्शन

Polity संघ लोक सेवा आयोग

अध्याय 1: एतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत का संवैधानिक विकास :-

भारत का संविधान एक दिन की उपज न होकर वर्षों के अनुभव का प्रकाश पुंज है। इसकी जड़े स्वतंत्रता के वट वृक्ष की जड़ों से जकड़ी हुई है। इसका इतिहास ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना के साथ प्रारंभ और अंत सन् 1950 में होता है। 24 सितंबर 1599 ई. को लंदन के कुछ प्रमुख व्यापारियों ने फाउंडर्स हाल में एक सभा की जिसकी अध्यक्षता नगरपालिका एक अध्यक्ष लॉर्ड मेयर ने की। गंभीर सोच विचार के बाद इन व्यापारियों ने व्यापार संबंधी अधिकार प्राप्त करने के लिए महारानी एलिजाब्रेथ की सेवा में एक प्रार्थनापत्र भेजा। महारानी ने इस प्रार्थनापत्र पर 31 दिसंबर 1600 ई को अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। इस प्रकार भारत एवम दक्षिण पूर्व देशों के साथ व्यापार करने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई जिसका नाम गवर्नर एंड कंपनी ऑफ मर्चेंट्स इन टू द ईस्ट ( पूर्वी इंडीज में व्यापार करने वाले व्यापारियों की कंपनी और प्रशासन) रखा गया। इस कंपनी का सारा प्रशासन एक परिषद को सौंपा गया जिसके शिखर पर गवर्नर और 24 अन्य सदस्य थे। उल्लेखनीय है कि इसे गवर्नर और उसकी परिषद की संज्ञा दी गई। 1726 के चार्टर द्वारा कलकत्ता, बंबई तथा मद्रास प्रेसीडेंसियों के राज्यपालों तथा उनकी परिषद को विधि बनाने की शक्ति प्रदान की गई। इसके पहले यह शक्ति इंग्लैंड स्थित निर्देशक बोर्ड में निहित थी।

भारत के संवैधानिक विकास को हम 2 भागों में बांट सकते है:

  1. ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के अंतर्गत संवैधानिक विकास और
  2. ब्रिटेन की सरकार के शासन के अंतर्गत संवैधानिक विकास

जिस समय तक (1858 ई) ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन रहा, ब्रिटेन की संसद विभिन्न अवसरों पर विभिन्न कानून व आदेश पत्रों को जारी करके कंपनी के शासन पर नियंत्रण रखती रही और इसने स्वयं भारत के शासन को अपने हाथों में ले लिया तब भी उसने भारत के शासन के लिए विभिन्न कानून बनाए। उन सभी आदेश पत्रों और कानूनों को हम भारत के संवैधानिक विकास में सम्मिलित करते है।

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