नैतिक मूल्य आत्मनिष्ठ है या वस्तुनिष्ठ

Ethics संघ लोक सेवा आयोग

वस्तुनिष्ठता (Objectivity) से तात्पर्य ऐसी स्थिति से है जिसके संबंध में सर्वसम्मति रहती है। वहां कोई मतभिन्नता नहीं होती। पूर्ण वस्तुनिष्ठता की स्थिति हम ‘शुद्ध गणित’ (Pure mathematics) और ‘शुद्ध तर्कशास्त्र’ (Pure logic) में पाते हैं। वहीं, आत्मनिष्ठता (Subjectivity) की स्थिति में मतभिन्नता स्वाभाविक तौर पर पाई जाती है। अब यदि हम नैतिक मूल्यों की बात करें तो यदि कोई नैतिक मूल्य समय, स्थान, परिस्थिति से प्रभावित होता हेतु उसमे आत्मनिष्ठता की मात्रा अधिक पाई जायेगी, यदि नहीं तो वस्तुनिष्ठता अधिक होगी मूल्य की वस्तुनिष्ठता की कसौटी उसका सामाजिक दायरा होता है। जितने अधिक क्षेत्र में वह मूल्य फैला होगी उतनी ही उसमे वस्तुनिष्ठता की मात्रा अधिक पाई जायेगी। ध्यातव्य है कि मूल्य न शुद्ध रूप से वस्तुनिष्ठ है और न ही शुद्ध रूप से आत्मनिस्थ। अलग-अलग मूल्यों में वस्तुनिष्ठता का स्तर भी अलग-अलग होता है।

कुछ मूल्य लगभग हर समाज, हर समय और लगभग हर परिस्थिति में एक समान माने जाते हैं जैसे – शांति, सत्य आदि। इन मूल्यों में वस्तुनिष्ठता ज्यादा है। कुछ मूल्य ऐसे हैं जो जितने वस्तुनिष्ठ है उतने ही आत्मनिष्ठ। जैसे – शाकाहार और मांसाहार, गर्भपात, फांसी आदि।

कुछ मूल्यों में वस्तुनिष्ठता की अपेक्षा आत्मनिष्ठता की मात्रा अधिक पाई जाती है। ये कुछ वर्ग विशेषों द्वारा ही मान्य होते है। जैसे : समलैंगिक विवाह, वैश्यावृत्ति आदि। वहीं कुछ मूल्य ऐसे है जिनके विरोध में वस्तुनिष्ठता पाई जाती है न की पक्ष में जैसे नरभक्षी प्रवृत्ति।

वस्तुनिष्ठता एवम आत्मनिष्ठता का एक अन्य आयाम किसी समाज विशेष का अन्य समाजों से संपर्क की मात्रा भी है। ग्रामीण एवम आदिवासी समाज जिनका बाहरी समाजों से कम संपर्क है, वहां के मूल्यों में वस्तुनिष्ठता ज्यादा होगी। वहीं एक मेट्रो शहर में ठीक इसके विपरित स्थिति मिलेगी।

नैतिक मूल्यों का निर्धारण कैसे होता है :-

नैतिक मूल्यों का विकास समाज के अंदर होता है। परन्तु इनके निर्धारण एवम विकास में अनेक आधारों की भूमिका होती हैं। यथा : भौगोलिक परिस्थितियां, अन्य समाजों से अंतःक्रिया, सांस्कृतिक सापेक्षता, अर्थव्यवस्था आदि।

  1. भौगोलिक परिस्थितियां : किसी प्रदेश विशेष की भौगोलिक परिस्थितियां वहां विभिन्न मूल्यों के निर्धारण में महत्ती भूमिका निभाती है। जैसे:

i) तापमान : अरब देशों में प्रायः धूल भरी आंधियां चलती रहती हैं। इनसे बचने के लिए वहां महिलाएं प्रायः बुर्का तथा पुरुष भी ज्यादा वस्त्र पहनते हैं। वहीं, हम देखते हैं कि उष्णकटिबंधीय गर्म क्षेत्रों के लोग प्रायः ढीले-ढाले तथा काम वस्त्र पहनते है। जैसे-जैसे हम ठंडे प्रदेशों (यूरोप) की ओर जाते हैं तो वहां ज्यादा वस्त्र पहने जाते हैं तथा खान-पान में मद्य (Alcohol) का प्रयोग सामान्य माना जाता है।

ii) उपजाऊ भूमि : जिन प्रदेशों की भूमि उपजाऊ होती है, वहां प्रायः शाकाहार का प्रचलन मिलता है, वहीं इसके विपरित परिस्थितियों में मांसाहार की प्रवृति पाई जाती है।

iii) उच्चवाच : पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में धैर्य और मेहनत जैसे मूल्य प्रायः मैदानी क्षेत्रों के लोगों से अधिक पाया जाता है क्योंकि उनका जीवन से संघर्ष ज्यादा होता है।

2. अन्य समाजों से अंतरक्रियां :- जो ग्रामीण या आदिवासी क्षेत्र अन्य समाजों/ गांवों से कम संपर्क में रहते है, उनमें रूढ़िवादिता (Orthodoxy) अधिक पाई जाती है। इसके विपरित किसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित गांव या किसी बड़े शहर में मूल्यों में गतिशीलता (Flexibility) अधिक पाई जाती है।

3. जनकिकी : विभिन्न समाजों में जनकिकी भी मूल्यों के निर्धारण में अहम भूमिका निभाती है। जनकिकी के अंतर्गत विभिन्न पहलू आते है – लिंग अनुपात, जीवन प्रत्याशा, आबादी आदि।

i) लिंग अनुपात :- जिन समाजों में लिंग अनुपात बराबर होता है वहां एक विवाह की परंपरा मिलती है वहीं यदि यह अनुपात बहुत अधिक बिगड़ा हो तो प्रायः बहुपत्नी या बहुपति विवाह का प्रचलन देखने को मिलता है।

उदाहरण के तौर पर आज भी देहरादून के पास एक आदिवासी इलाके के खस समुदाय में बहुपति प्रथा का प्रचलन है।

ii) जीवन प्रत्याशा :- जिन समाजों में जीवन प्रत्याशा बहुत अधिक होती है और संसाधन भी पर्याप्त होते हैं, वहां वृद्धों को ज्यादा सुविधाएं और सम्मान मिलता है जैसे जापान में। परंतु यदि जीवन प्रत्याशा अत्यधिक हो और संसाधनों की कमी हो, तो उस समाज में वृद्धों की स्थिति सोचनीय हो जाती है। उदाहरण के तौर पर उत्तरी ध्रुव पर पाई जाने वाली एस्कीमो जनजाति में वृद्ध संसाधनों के अभाव में युवा पीढ़ी के भविष्य के लिए अपनी इच्छा से प्राण दे देते है।

4. आर्थिक कारक :- किसी समाज में अर्थव्यवथा का क्या प्रारूप है, यह निश्चित

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