भारतीय राजव्यवस्था की प्रकृति का परिचय

Indian constitution Polity संघ लोक सेवा आयोग

प्रस्तावना बताती है कि भारतीय राजव्यवस्था की प्रकृति क्या है? इसे स्पष्ट करने के लिए प्रस्तावना के निम्नलिखित 5 शब्द विशेष महत्व के हैं :

  1. संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न: इसका अर्थ है कि भारत अपने आंतरिक और विदेश संबंधी मामलों में कोई भी स्वतंत्र निर्णय लेने की ताकत रखता है वह किसी भी अन्य विदेशी सत्ता के अधीन नहीं है। इस संबंध में यह जानना महत्वपूर्ण है कि भारत के राष्ट्रकुल का सदस्य बनने पर यह प्रश्न उठाया गया था कि भारत संप्रभु देश है या नहीं ? ध्यातव्य है कि जिस तरह आयरलैंड ने ‘रिपब्लिक आफ आयरलैंड 1948′ बनाकर ब्रिटिश राष्ट्रकुल से अपने सारे संबंध समाप्त कर लिए थे वैसा भारत में नहीं किया। पाकिस्तान 1956 तक ब्रिटिश डोमिनियन बना रहा कि तो भारत में संविधान को लागू करने के साथ ही खुद को गणराज्य घोषित किया जिसका अर्थ था कि भारत ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति निष्ठा नहीं रखता है और भारत का राज्य अध्यक्ष अर्थात राष्ट्रपति जनता में ऐसे ही निर्वाचित होगा। भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लंदन में अप्रैल 1949 में प्रधानमंत्री को सम्मेलन में घोषणा की थी कि भारत संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न गणराज्य बन जाने के बावजूद राष्ट्रकुल का सदस्य बना रहेगा। भारत राष्ट्रकुल को स्वाधीन राष्ट्रों के एक स्वतंत्र संगठन के रूप में देखता न के ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के रूप में। भारत ब्रिटिश सम्राट को राष्ट्रकुल के अध्यक्ष के रूप में सिर्फ प्रतीकात्मक तौर पर स्वीकार करता है उसकी जय शक्ति भारत गणराज्य के आर्थिक मामलों पर लागू नहीं होगी
  2. समाजवादी: इसका अर्थ है कि भारत की राज्य व्यवस्था की संरचना समाजवादी विचारधारा के अनुरूप बनाई गई है। ध्यातव्य है कि समाजवाद शब्द संविधान की मूल प्रस्तावना में नहीं था मैं 42 वें संविधान संशोधन द्वारा 1976 ईस्वी में प्रस्तावना में शामिल किया गया है। भारतीय समाजवाद यूरोप के समाजवाद से कुछ अलग तथा अपने खास ढंग का है यह भूतपूर्व सोवियत संघ या अन्य साम्यवादी राज्यों की तरह निजी संपत्ति व निजी उद्यमशीलता का उन्मूलन नहीं करता बल्कि आर्थिक न्याय की धारणा को लोकतंत्र के साथ मिलाकर चलता है। इस दृष्टि से इसे लोकतांत्रिक समाजवाद कहा जा सकता है जिसमें अर्थव्यवस्था के स्तर पर निजी दम शीलता और सरकारी नियंत्रण जैसे तत्वों साथ-साथ अस्तित्व में होते हैं। इसके अलावा यह कार्ल मार्क्स द्वारा प्रतिपादित हिंसक संघर्ष सिद्धांत को अस्वीकार करता है और अहिंसक नीतियों के माध्यम से समाजवाद की उपलब्धि करना चाहता है। सर्वोच्च न्यायालय ने डी. एस. नकारा बनाम भारत संघ’ (1982) मामले में स्पष्ट भी किया कि “भारतीय समाजवाद गांधीवाद और मार्क्सवाद का अनोखा मिश्रण है जो निश्चित रूप से गांधीवाद की ओर झुका हुआ है।” इस व्याख्या का निहितार्थ यही है कि हमारा समाजवाद आर्थिक समानता, आय के समान वितरण, वंचित वर्गों के जीवन स्तर को ऊंचा करने तथा उन्हें अधिकाधिक सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने पर बल देता है किंतु इन सभी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए वह अहिंसक और शांतिपूर्ण साधनों का उपयोग करता है तथा निजी संपत्ति व उद्यमशीलता को खारिज किए बिना दोनों पक्षों में समन्वय साधने का प्रयास करते हैं।

  1. 1991 से भारतीय राज्य के समाजवादी ढांचे में एक गंभीर परिवर्तन देखा गया है। इस वर्ष से लागू हुई आर्थिक नीति के अंतर्गत निजीकरण उदारीकरण तथा भूमंडलीकरण पर काफी अधिक बल दिया जाने लगा है अब भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व अर्थव्यवस्था के साथ काफी हद तक जुड़ चुकी है। समाजवादी दलों तथा चिंतकों का आक्षेप है कि अब भारतीय राज्य समाजवादी नहीं नव उदारवादी हो गया है।

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