मुद्रास्फीति

Indian economy संघ लोक सेवा आयोग

मुद्रास्फीति वस्तुओं एवम सेवाओं के मूल्य में निरंतर बढ़ोत्तरी की वह दशा है जिसके कारण एक देश की मुद्रा की क्रय क्षमता में कमी उत्पन्न होती है। यही कारण है कि जब किसी मुद्रा की क्रय क्षमता शून्य हो जाती है तब उसे परिचालन से बाहर कर दिया जाता है। वर्तमान में भारत में प्रयोग होने वाली सबसे छोटी मुद्रा 50 पैसा है। परंतु 50 पैसे के सिक्को का प्रयोग मात्र 10₹ तक के भुगतान के उद्देश्य से किया जा सकता है। एक सिक्के के आकार में कमी भी मुद्रास्फीति के कारण ही लाई जाती है। एक सिक्के में उतने ही मूल्य के धातु का प्रयोग होना चाहिए जो कि सिक्के के बाजारी मूल्य के बराबर अथवा उससे कम हो।

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मुद्रास्फीति का सर्वाधिक प्रभाव गरीबों पर पड़ता है। गरीबों के पास संसाधन सीमित होते है। अतः यदि उनके आय में बढ़ोत्तरी न हो एवम मूल्यों में बढ़ोत्तरी हो जाए तब ऐसे में उनका उपभोग प्रभावित होता है। अमीरों पर मुद्रास्फीति का प्रभाव नगण्य होता है। चूंकि अमीरों के पास अधिशेष होता है उस अधिशेष का प्रयोग संपत्ति में निवेश के उद्देश्य से किया जा सकता है। अतः वस्तुओं एवम सेवाओं के मूल्य में बढ़ोत्तरी के साथ साथ संपत्ति के मूल्य में भी बढ़ोत्तरी होगी। इसके माध्यम से मुद्रास्फीति के प्रभाव को निरस्त किया जा सकता है। मुद्रास्फीति हमारे बचत पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। यदि मुद्रास्फीति की गति तीव्र हो एवम जमा राशि पर बैंको द्वारा दिया गया व्याज कम हो तब ऐसे में उपभोक्ता अपने धन को बैंकों में न जमा करके उसका उपभोग कर जायेगा। इसके कारण बैंकों की जमा राशि प्रभावित होगी। अतः जमाकर्ता को आकर्षित करने के उद्देश्य से बैंक जमा राशि पर ब्याज दर बढ़ा देगी। यह बैंको को दिए गए ऋण पर ब्याज दर बढ़ान के लिए विवश करेगी। यदि यदि ऋण पर ब्याज दर में बढ़ोत्तरी हो जाए तब ऐसे में उपभोग एवम निवेश डोना ही प्रभावित होगें। यदि मुद्रास्फीति तीव्र गति से बढ़ती है तब इससे ऋणी को लाभ होगा जबकि ऋण दाता को क्षति होगी।

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