नीतिशास्त्र और मानवीय सह-सम्बन्ध (ETHICS AND HUMAN INTERFACE)

Ethics संघ लोक सेवा आयोग

मानव मूल्य (Human Value) :

‘मानव मूल्य’ में जिस शब्द को समझने की जरुरत है वह है – ‘मूल्य’ । सामान्य शब्दों में हम कह सकते है, जिसका जितना महत्व है उसका उतना मूल्य है। मूल्य की व्याख्या विभिन्न क्षेत्रों में अपने अपने तरीके से होती है। जैसे, अर्थव्यवस्था में जिसकी जितनी मांग है उसका उतना मूल्य है, नीतिशास्त्र में जो अनुचित है वह मूल्यहीन है और सौंदर्यशास्त्र में जो सुंदर है वह मूल्यवान है।

मूल्यों का अर्थ सबसे गहरे नैतिक आदर्शों से होता है जिन्हे उपलब्ध करने के लिए नैतिक नियम इत्यादि बनाए जाते है। उदाहरण के लिए, शांति, न्याय, सहिष्णुत, आनंद, ईमानदारी, समयबद्धता आदि प्रसिद्ध मूल्य है। मूल्यों के संबंध में समाज की समझ होती है कि वे सामाजिक जीवन को संभव व श्रेष्ठ बनाने के लिए आवश्यक है।

मूल्यों को साकार करने के लिए सामाजिक मानक, रीति-रिवाज, परंपराएं, प्रथाएं इत्यादि निर्मित होती है। उदाहरण के लिए, बड़ों का आदर करना एक मूल्य है जिसकी अभिव्यक्ति के लिए बड़ों के पैर छूना आदि सामाजिक नियम बनाए गए हैं। विवाह संस्था भी एक रीति है जिसका उद्देश्य मनुष्यों की यौन तथा पारिवारिक आवश्यकताओ को शांतिपूर्ण तरीके से संतुष्ट करना है।

मूल्यों की विशेषताएं :

नैतिक मूल्यों का विकासक्रम ही उनकी विषेताएं तय करता है। कोई भी मूल्य प्रायः प्रारंभ में एक व्यक्तिगत आदत (Individual Habit) होता है जो उचित प्रतीत होने के कारण कालांतर में सामाजिक व्यवहार (Social behaviour) बन जाता है। जब यह सामाजिक व्यवहार कुछ प्रतिमानों के साथ मजबूती से स्थापित होता है तो एक परंपरा विकसित होती है जो कालांतर में समाज की अपेक्षाकृत मजबूत प्रथा (Custom) बन जाती है जैसे सती प्रथा। प्रथा का अनुपालन जब उग्रता एवम दृढ़ता से किया जाता है तो वह प्रथा लोक रीति (More) कहलाती है जैसे – पशुबली। किसी मूल्य के विकास का अगला चरण उसका संस्थागत स्वरूप (Institutional Form) होता है। जैसे – ‘विवाह संस्था’ ।

विशेषताएं :-

  1. मूल्य आदर्श के रूप में होते है। जिस प्रकार किसी आदर्श को कभी भी पूर्णतया प्राप्त नही किया जा सकता उसी प्रकार नैतिक मूल्यों की समाज में पूर्ण स्थापना नहीं की जा सकती। उस आदर्श की तरफ पहुंचने का प्रयत्न किया जाना चाहिए। जैसे: न्याय, समानता एवम स्वतंत्रता का मूल्य।
  2. मूल्य जन्मजात नही होते। ये सीखे जाते है। मूल्यों को सीखने की प्रक्रिया ‘समाजीकरण’ कहलाती है। जैसे : बड़ों के पैर छूकर उन्हें सम्मान देने का मूल्य हम सीखते है। यदि मूल्य अनुवांशिक होते तो यह मूल्य विश्व के सभी समाजों में पाया जाता।
  3. मूल्यों की स्थापना एक लंबे विकासक्रम के फलस्वरूप होती है। अतः ये सापेक्षता स्थिर होते है।
  4. मूल्यों में एक सोपानक्रम होता है। कुछ मूल्य बहुत उच्च स्तर पर होते है, जिन्हे मूल्यों का आदर्श रूप भी कहा जा सकता है, जैसे : आनंद, शांति आदि मूल्य तो कुछ मूल्य सोपानक्रम में निचले स्तर पर होते है।
  5. मूल्य अमूर्त रूप (Abstract) होते है। इनके बारे में सोचा का सकता है। विभिन्न नैतिक प्रतिमान इनके मूर्त रूप होते है।

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