समानुभूति का दार्शनिक और संवैधानिक आधार

Ethics संघ लोक सेवा आयोग

दार्शनिक आधार : समानुभूति के दार्शनिक आधार को समझने के लिए गांधी के ईश्वर और अहिंसा की विचारधारा को आधार माना जा सकता है। गांधी का मानना है की सत्य ही ईश्वर है अतः प्रत्येक व्यक्ति के लिए ईश्वर एकसमान है। ईश्वर परमात्मा का रूप है और प्रत्येक मनुष्य उसी ईश्वर की संतान है। अतः प्रत्येक मनुष्य उसी ईश्वर की संतान है। अतः प्रत्येक मनुष्य में उसी परमात्मा का अंश आत्मा है। अतः प्रत्येक मनुष्य आध्यात्मिक या आत्मिक रूप से एक समान है। अतः प्रत्येक मनुष्य को दूसरे मनुष्य के प्रति प्रेम और बंधुत्व की भावना होनी चाहिए।

संवैधानिक आधार : भारत के संविधान का प्रथम वाक्य ‘हम भारत के लोग’ में हम शब्द भावनात्मक समरूपता की स्थिति को इंगित करता है। मैं और तुम के भेद से ऊपर उठकर व्यक्ति ‘हम’ की स्थिति में कार्य करने पर बल देता है। सभी के बीच बंधुत्व और भाईचारे का संदेश देता है।

इसी संदर्भ में अरस्तु के Golden Rule को भी समानुभुति का आधार माना जा सकता है। Golden Rule के अनुसार एक व्यक्ति को कभी भी दूसरे व्यक्ति के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए जो वह अपने प्रति वैसा व्यवहार पसंद नही करता।

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