आर्थिक संवृद्धि एवम आर्थिक विकास

Indian economy संघ लोक सेवा आयोग

आर्थिक संवृद्धि एवम आर्थिक विकास एक दूसरे से संबंधित तो है परंतु एक दूसरे के समानार्थी नही है। संवृद्धि एक मात्रात्मक अवधारणा है जबकि विकास एक गुणात्मक अवधारणा है। आर्थिक संवृद्धि एक निश्चित समय में उत्पादन में बढ़ोत्तरी अथवा सकल घरेलू उत्पाद में बढ़ोत्तरी को संबोधित करती है। इससे भिन्न उत्पादन में बढ़ोत्तरी का लाभ समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचें तब इसे आर्थिक विकास कहा जाता है। उदाहरण स्वरूप हरित क्रांति ने खाद्यान्न के उत्पादन को बढ़ावा दिया, इसे संवृद्धि कहा जायेगा परंतु आज भी भारत में भुखमरी जैसी समस्या उपस्थित है। यह दर्शाता है की विकास की प्रक्रिया अब भी अधूरी है। अतः यदि खाद्यान के उत्पादन में बढ़ोत्तरी के साथ साथ देश में खाद्य सुरक्षा भी सुनिश्चित की जाए तो यह आर्थिक विकास कहलाएगा। अतः यह कहा जा सकता है की बिना आर्थिक संवृद्धि के माध्यम से विकास सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है।

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समावेशी विकास एवम सतत विकास (सम्पोषी) :

समावेशी विकास के दो प्रमुख पक्ष होते है –

  1. सबका विकास
  2. चौतरफा विकास

सबका विकास से तात्पर्य है की विकास की प्रक्रिया में समाज का एक भी सदस्य पिछड़ा न रह जाए अर्थात विकास की प्रक्रिया का लाभ प्रत्येक व्यक्ति का प्राप्त हो। यह प्रक्रिया महात्मा गांधी के अंत्योदय एवम सर्वोदय की अवधारणा पर आधारित है। इसके अनुसार विकास की प्रक्रिया का लाभ समाज के इन सदस्यों तक भी पहुंचें जो की अधिकतम में सबसे निम्न स्तर पर हैं। यह सामाजिक न्याय की अवधारणा पर आधारित है। John Rawls के अनुसार – एक जंजीर उतनी ही सशक्त होती है जितनी की इसकी एक कमजोर कड़ी। इसी प्रकार एक समाज उतना ही सशक्त होता है जितना की उसका सबसे कमजोर सदस्य। अतः समाज के सशक्तिकरण के लिए इसके सबसे कमजोर सदस्य का सशक्तिकरण अनिवार्य है।

दूसरी ओर चौतरफा विकास का अर्थ है आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवम राजनैतिक विकास। आर्थिक विकास का अर्थ है – ‘गरीबी उन्मूलन’ एवम बेरोजगारी इत्यादि को दूर करना। इससे भिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक विकास, जाति प्रजाति, लिंग, धर्म इत्यादि के आधार पर उपस्थित भेदभाव को संबोधित करता है। राजनैतिक विकास से तात्पर्य है – राजनैतिक भागीदारी सुनिश्चित करना। यह मतदान के अधिकार एवम चुनाव में हिस्सा लेने के अधिकार को संबोधित करता है। सम्मिलित रूप से यह समावेशी विकास कहलाते हैं।

सतत विकास, विकास की वह प्रक्रिया है जो कि पीढ़ी दर पीढ़ी निरंतर जारी रह सके। विकास की प्रक्रिया में पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव देखा जा सकता है। अतः विकास की वह प्रक्रिया को पर्यावरण को भी संरक्षित रखे एवम जिसमें संसाधनों का उपभोग भी नैतिक तरीके से हो सतत विकास की प्रक्रिया कहलाती है। यह प्रक्रिया इस मान्यता पर आधारित है की यह पृथ्वी एवम इस पर उपलब्ध संसाधन हमने अपने पूर्वजों से विरासत के रूप में प्राप्त नहीं की है। बल्कि यह एक कर्ज है जो हमें आने वाली पीढ़ियों को वापस करके जाना होगा।

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