1786 का अधिनियम (Act of 1786)

Polity संघ लोक सेवा आयोग

इस अधिनियम के द्वारा गवर्नर जनरल को विशेष परिस्थिति में अपने परिषद के निर्णयों को निरस्त कर अपने निर्णयों को लागू करने का अधिकार प्रदान किया गया और साथ ही गवर्नर जनरल को प्रधान सेनापति की शक्तियां भी प्रदान की गई। लॉर्ड कॉर्नवालिस गवर्नर जनरल और मुख्य सेनापति की शक्ति को एक ही व्यक्ति के पास चाहता था। लॉर्ड कॉर्नवालिस वास्तव में वह पहला व्यक्ति था जिसे दोनो पद सौंपे गए और परिषद के निर्णयों को निषेध(Veto) करने का अधिकार प्राप्त हुआ।

1793 का चार्टर एक्ट (Charter Act of 1793)

  1. इसका मुख्य उद्देश्य कंपनी का अगले 20 वर्षों के लिए पूर्वी देशों से व्यापार करने एकाधिपत्य का नवीनीकरण करना था। इस प्रकार कंपनी के अधिकारों को 20 वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया।
  2. परिषद के निर्णयों को रद्द करने का को अधिकार गवर्नर जनरल को दे दिया गया।
  3. बोर्ड ऑफ कंट्रोल के सदस्यों और कर्मचारियों को वेतन भारतीय राजस्व से देने का प्रावधान किया गया।
  4. गवर्नर जनरल को अपनी कार्यकारिणी के सदस्यों में से किसी एक को उप प्रधान नियुक्त करने का अधिकार दिया गया जो गवर्नर जनरल की अनुपस्थिति में उसके स्थान पर कार्य करता था।
  5. ब्रिटिश भारतीय क्षेत्रों में लिखित विधियों द्वारा प्रशासन की नीव रखी गई तथा सभी कानूनों व विनियामो की व्याख्या का अधिकार न्यायालय को प्रदान किया गया।

आलोचना :

1793 ई. का शासन पत्र अधिनियम काफी लंबा था, किंतु यह कंपनी और शासन में कोई विशेष परिवर्तन न ला सका इसने केंद्रीयकरण की प्रवृति को बढ़ा दिया। यह दुर्भाग्य की बात है कि इसने बोर्ड ऑफ कंट्रोल और इसके कर्मचारियों के वेतन व अन्य खर्चों का संपूर्ण भारत के राजस्व पर डाल दिया, जिसका बाद में भारतीयों ने तीव्र विरोध किया और जो 1919 ई. के अधिनियम से समाप्त किया गया।

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