स्तूपों का उद्भव एवम विकास

Art and culture संघ लोक सेवा आयोग

स्तूप की चर्चा सर्वप्रथम ऋग्वेद में प्राप्त होती है। बौद्ध परंपरा (महापरिनिर्वाण सूत) के अनुसार बुद्ध के पूर्व चक्रवर्ती राजाओं एवम संतो के लिए स्तूप बनवाए जाते थे। गतपथ ब्राम्हण में भी इसकी चर्चा मिलती है। बौद्ध परंपराओं में इसका विकास बुद्ध की मृत्यु के बाद किया गया जिसे चार चरणों में बांटकर देखा जा सकता है-

  1. मौर्यपूर्व काल : बुद्ध के मृत्य के तत्काल बाद उनके अनुयाायियों द्वारा उनके अवशेषों पर आठ स्थानों पर स्पूतों का निर्माण कराया गया। ये सभी स्तूप साधारण प्रकार के थेे, जो वर्तमान में नष्ट प्राय हो चुके है।
  2. मौर्यकाल : मौर्यकाल में अशोक द्वारा 84,000 स्तूपों का निर्माण कराया गाया। इसमें सांची भरहुत चौखंडी (सारनाथ) तथा धर्मराजिका जैसे स्तूप अत्यंत महत्वपूर्ण है। अशोक के नए स्तूपों के निर्माण के साथ-साथ पुराने स्तूपों जैसे कनक मुनी स्तूप (निगाली सागर नेपाल) का जीर्णोधार भी कराया था।
  3. मौर्योत्तर काल : स्तूपों के निर्माण की दृष्टि से मौर्योत्तर काल चरमोत्कर्ष का काल था इस काल के पूर्व एवम इसके बाद वैसा निर्माण नही हुआ जैसा कि इस काल में दिखाई देता है।

इस काल में शुंगों के संरक्षण में सांची तथा भरहुत के स्तूपों के मूल आकर को दो गुने से भी अधिक बड़ा बनाया गया। कुषाण शासकों (विशेषतः कनिष्क) द्वारा पेशावर मोहनजोदड़ो तक्षशिला आदि स्थानों पर कई स्तूप बनवाए गए। कृष्णा घाटी में सतवाहनो के संरक्षण में अमरावती नागार्जुनीकोंडा, जगथैपेट, गोली घंटशाला आदि स्थानों पर अनेक स्तूपों का निर्माण हुआ।

मौर्योत्तर कालीन स्तूपों में स्थापत्य एवम शिल्प कला का भव्यरूप दिखाई देता है। इस काल के बने शिल्पकला के दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस काल के स्तूपों के साथ बुद्ध के घटनाओं से जुड़े विषयों जातक कहानियों लोकपर्ण विषयों कथाओं (MOTIF) आम जीवन से संबंधित विषयों आदि को शिल्पों के माध्यम से स्तूपों की वेदिकाओं प्रवेश द्वारों पर काफी कलात्मक ढंग से उत्कीर्ण किया गया है।

गुप्तकाल : गुप्तकाल में भी स्तूपों के निर्माण की परंपरा जारी रही। इस काल के प्रमुख स्तूपों में सारनाथ का धमेख स्तूप, मीरपुर खास का स्तूप (सिंध PAK) आदि महत्वपूर्ण है। इस काल में एवम इसके बाद भी स्तूप का निर्माण जारी रहा किंतु उसकी भव्यता में अब गिरावट आई।

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