समावेशी विकास एवं सतत विकास ( समावेशी )

Indian economy संघ लोक सेवा आयोग

समावेशी विकास के दो प्रमुख पक्ष होते है: –

  • सबका विकास * चौतरफा विकास

सबका विकास से तात्पर्य है विकास की प्रक्रिया में समाज का एक भी सदस्य पिछड़ा न रह जाये। अर्थात विकास की प्रक्रिया का लाभ प्रत्येक व्यक्ति को प्राप्त हो। यह प्रक्रिया महात्मा गाँधी के अंत्योदय ( निम्न स्तर वाला) एवं सर्वोदय की अवधारणा पर आधारित है। इसके अनुसार विकास की प्रक्रिया का लाभ समाज के उन सदस्यों तक भी पहुचें जो की अधिकतम (HIEARCHY ) में सबसे निम्न स्तर पर है। यह सामाजिक न्याय की अवधारणा पर आधारित है। John Rawls के अनुसार – एक जंजीर उतनी ही सशक्त होती है जितनी की उसकी एक कमजोर कड़ी। इसी प्रकार एक समाज उतना ही सशक्त होता है जितना की उसका सबसे कमजोर सदस्य। अतः समाज के सशक्तिकरण के लिए इसके सबसे कमजोर सदस्य का सशक्तिकरण अनिवार्य है।

दूसरी ओर चौतरफा विकास का अर्थ है आर्थिक,सामाजिक,सांस्कृतिक एवं राजनैतिक विकास। आर्थिक विकास का अर्थ है – ‘ गरीबी उन्मूलन’ एवं बेरोजगारी इत्यादि को दूर करना। इससे भिन्न सामाजिक,सांस्कृतिक विकास , जाति-प्रजाति, लिंग, धर्म इत्यादि के आधार उपस्थित भेदभाव को सम्बोधित करता है। राजनैतिक विकास से तात्पर्य है-राजनैतिक भागीदारी सुनिश्चित करना। यह मतदान के अधिकार एवं चुनाव में हिस्सा लेने के अधिकार को सम्बोधित करता है। सम्मिलित रूप से यही समावेशी विक्ष कहलाते है।

सतत विकास, विकास की वह प्रक्रिया है जो कि पीढ़ी दर पीढ़ी निरंतर जारी रह सके। विकास कि प्रक्रिया में पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव देखा जा सकता है। इस प्रक्रिया में संसाधनों का दोहन भी देखा जा सकता है। अतः विकास की वह प्रक्रिया जो पर्यावरण को भी संरक्षित रखे एवं जिसमे संसाधनों का उपभोग भी नैतिक तरीके से हो सतत विकास की प्रक्रिया कहलाती है। यह प्रक्रिया इस मान्यता पर आधारित है कि यह पृथ्वी एवं इस पर उपलब्ध संसाधन हमने अपने पूर्वजों से विरासत के रूप में प्राप्त नहीं की है। बलिक यह एक कर्ज है जो हमे आने वाली पीढ़ियों को वापस करके जाना होगा।

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