लोक अदालतों में न्याय की गुणवत्ता पर भी ध्यान हो

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हमारी न्यायिक व्यवस्था, गरीबों को उचित न्याय उपलब्ध कराने की संवैधानिक प्रतिबद्धता रखती है। इस लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए लोक अदालतों का गठन किया गया था। इसका उद्देश्य न्यायालयों में लंबित मामलों के ढेर को देखते हुए जरूरतमंद लोगों को वहन योग्य और त्वरित न्याय दिलवाना रहा है।

लोक अदालतों से जुड़ा रोचक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इनके वैधानिक गठन से पहले भी इनका अस्तित्व रहा है। 1949 में महात्मा गांधी के एक शिष्य, हरीवल्लभ पारिख ने रंगपुर, गुजरात में इसको शुरू किया था। 42 वे संविधान संशोधन 1976 में अनुच्छेद 39(A) जोड़कर “समान न्याय और निशुल्क न्यायिक सहायता” को सुनिश्चित किया था। तत्पश्चात न्यायिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 लाया गया, और यह 1995 में सक्रिय हुआ। इसके माध्यम से समाज के कमजोर वर्ग को निशुल्क और उत्तम न्यायिक सेवा प्रदान करना सुनिश्चित किया गया था। इसके लिए लोक अदालतों का गठन किया गया।

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