वर्ण व्यवस्था (Varna System)

Uncategorized

किसी भी समाज के व्यवस्थित संचालन हेतु आवश्यक माना जाता है कि समाजिक कार्यों का विभाजन व्यक्ति की योगिता, प्रकृति, प्रवृत्ति एवं उसके गुण व कर्मो के आधार पर किया जाए। व्यक्ति की कार्य क्षमता के आधार पर कर्म विभाजन करने को वर्ण व्यवस्था कहा जाता है। साधारण शब्दों मे इसे विवेचित कर सकते हैं- जिस व्यवस्था के द्वारा व्यक्ति अपनी कार्य क्षमता के आधार पर कर्म का वरण करता है, वह वर्ण व्यवस्था कहलाती है। वर्ण शब्द की उत्पत्ति ‘वृ’ धातु से मानी गई है, जिसका अर्थ है- वरण करना या चुनना। इसके अतिरिक्त वर्ण शब्द ‘रंग’ के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। यद्यपि मनुस्मृति में वर्ण व जाति शब्द प्राय: एक ही अर्थ में प्रयोग किए गए हैं, जैसा कि वर्तमान में भी देखने को मिलता है।

भारतीय सामाजिक व्यवस्था का मूलाधार इसी व्यवस्था को माना गया है। हालांकि विश्व भर के अधिकांश समाजों में समाजिक स्थिरीकरण का आधार ‘वर्ग’ को माना गया है, जबकि भारत में प्राचीन काल से ही ‘वर्ण एवं जाति ‘की व्यवस्था विद्यमान रही है। अनुमान है कि भारतीय समाज में कृषि विकास के परिणाम स्वरूप एक नई उत्पादन व्यवस्था विकसित हुई, जिसके संचालन के लिए श्रम विभाजन की आवश्यकता पड़ी और परिणाम स्वरूप समाज में वर्ण व्यवस्था का उदय हुआ। श्रम एवं व्यवसाय के आधार जन्मे इन समाजिक वर्णों को ब्राह्मण, क्षत्रिय , वैश्य तथा शूद्र कहा गया ।

धार्मिक क्रियाओं एवं ज्ञान का संपादन ब्राह्मणों का वर्ण- धर्म माना गया। प्रशासन एवं सत्ता का कार्य क्षत्रियो का। आर्थिक उत्पादन और वितरण कार्य वैश्यों का वर्ण- धर्म था, जबकि शूद्रों का वर्ण – धर्म शारीरिक श्रम एवं सेवा का कार्य माना गया था। व्यवसाय पर आधारित होने के कारण वर्ण व्यवस्था कठोर नहीं थी। इस संदर्भ में ऋग्वेद एक प्रसिद्ध उद्धरण महत्वपूर्ण है- ” मै कवि हूं, मेरे पिता वैद्य है, मेरी मां पत्थर की चक्की चलाती है। धन की कामना करने वाले , नाना कर्मों वाले हम एक साथ रहते है।” इस प्रकार कह सकते हैं कि वर्ण व्यक्ति के गुण तथा कर्म समान थे अर्थात् जो समान स्वभाव के थे, वे सभी एक ही वर्ण के सदस्य माने जाते थे। श्री कृष्ण ने भगवद्गगीता मे भी कहां है कि ” चातु वर्णय मया सृष्टं गुणकर्म विभागश:” अर्थात् मैंने ही गुण एवं कर्म के आधार पर चारो वर्णों की उत्पत्ति की है। इस कथन से स्पष्ट होता है। कि वर्ण व्यवस्था सामाजिक स्तरीकरण की ऐसी व्यवस्था है जो व्यक्ति के गुण तथा कर्म पर आधारित है तथा जिसके अन्तर्गत समाज का चार वर्गो के रूप में कार्यात्मक विभाजन हुआ है। गुड वर्क करना का यहां पर संबंध व्यक्ति के स्वभाव एवं सामाजिक दायित्वों से हैं। अत: समाज के विभिन्न कार्यों को संपन्न करने हेतु मनुष्यो के रुझानुसार उन्हें चार वर्गों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक वर्ण स्वयं के वर्ण – धर्म का पालन करते हुए दायित्वों का निर्वहन करता है। भारतीय विद्वान भारतीय समाज के इस चतुवर्णी विभाजन को कोरी कल्पना मानते हैं।परन्तु वास्तव में इसे कोरा आदर्श मानना भूल होगी, क्योंंकि यह पूर्वत: व्यावहारिक व्यवस्था रही है और इसका आधार भी मुख्यत: प्रजाति माना गया है तथा इसका मूल वेदों में मिलता है।

हालाकि यह स्थिति ज्यादा समय तक कायम नही रही और समय के साथ वर्णाश्रम व्यवस्था काफी कठोर होती गई। पूर्व में जो वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित थी, वह धीरे – धीरे जन्म पर आधारित हो गई। विभिन्न वर्णों का अलग – अलग एक व्यापक घेरा बन गया। वर्णों के बीच अंतर वर्णीय

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *