1.3 मिश्रित अर्थव्यवस्था

मिश्रित अर्थव्यवस्था न तो शुद्ध रूप से पूंजीवाद है और न ही शुद्ध रूप से समाजवाद है ; अपितु यह दोनो का मिश्रित रूप है। इस अर्थव्यवस्था में निजी उद्यमों और सार्वजनिक दोनो प्रकार के उद्यमों द्वारा संचालित होती है। इस अर्थव्यवस्था में निजी उद्यमों को मूल्य तंत्र के माध्यम से स्वतंत्र और अनियंत्रित रूप […]

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1.2 समाजवाद

समाजवाद का आशय समाज के एक आर्थिक संगठन से है, जिसमें उत्पादन के भौतिक साधन पर संपूर्ण समुदाय का स्वामित्व होता है। यह आर्थिक संगठन, समुदाय के प्रति उत्तरदायी होता है एवम उनके प्रतिनिधि निकायों द्वारा संचालित होता है। समान अधिकारों के आधार पर समुदाय के सभी सदस्यों का इस प्रकार के सामाजिक योजनाबद्ध उत्पादन […]

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1. आर्थिक प्रणालियाँ

वर्तमान में किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को पूर्णतः पूंजीवादी अर्थव्यवस्था अथवा पूर्णतः समाजवादी अर्थव्यवस्था की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता ! हालाँकि, वर्गीकरण के उद्देश्य से विभिन्न आर्थिक प्रणालियों को निम्नलिखित वर्गों में विभक्त किया जा सकता है : 1.1 पूंजीवाद :- i) पूंजीवाद के अंतर्गत, सभी कृषि क्षेत्रों, कारखानों एवं उत्पादन के […]

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मुगल साम्राज्य का पतन

1.1) पृष्ठभूमि मुगल साम्राज्य की स्थापना जहीरूद्दीन बाबर द्वारा 1526 ई. में पानीपत के प्रथम विजय के पश्चात की गई थी तथा साम्राज्य का विस्तार उनके उततराधिकारियो के समय में भी जारी रहा । औरंगजेब (1657-1707) के शासन काल में मुगल साम्राज्य का क्षेत्रीय विस्तार अपने चरम पर पहुंच गया था। इसके साथ ही विघटन […]

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नैतिक मूल्य आत्मनिष्ठ है या वस्तुनिष्ठ

वस्तुनिष्ठता (Objectivity) से तात्पर्य ऐसी स्थिति से है जिसके संबंध में सर्वसम्मति रहती है। वहां कोई मतभिन्नता नहीं होती। पूर्ण वस्तुनिष्ठता की स्थिति हम ‘शुद्ध गणित’ (Pure mathematics) और ‘शुद्ध तर्कशास्त्र’ (Pure logic) में पाते हैं। वहीं, आत्मनिष्ठता (Subjectivity) की स्थिति में मतभिन्नता स्वाभाविक तौर पर पाई जाती है। अब यदि हम नैतिक मूल्यों की […]

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मूल्यों के प्रकार

मानवीय मूल्यों को प्रमुखता दो भागो में बांटा जा सकता है – उद्देश्य की दृष्टि से : इस दृष्टि से मानव मूल्य ‘ साध्य ‘ और ‘ साधन ‘ दो उपवर्गों में विभाजित होते हैं। साध्य मूल्य वे मूल्य है जिन्हे हम पाना चाहते है। जैसे शांति, संतोष, न्याय, स्वतंत्रता, समानता, ज्ञान आदि। साधन मूल्य […]

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नीतिशास्त्र और मानवीय सह-सम्बन्ध (ETHICS AND HUMAN INTERFACE)

मानव मूल्य (Human Value) : ‘मानव मूल्य’ में जिस शब्द को समझने की जरुरत है वह है – ‘मूल्य’ । सामान्य शब्दों में हम कह सकते है, जिसका जितना महत्व है उसका उतना मूल्य है। मूल्य की व्याख्या विभिन्न क्षेत्रों में अपने अपने तरीके से होती है। जैसे, अर्थव्यवस्था में जिसकी जितनी मांग है उसका […]

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भारत में ब्रिटिश शासकों की आर्थिक नीति एवम उसका प्रभाव

भारतीय अर्थव्यवस्था पर ब्रिटिश प्रभाव मुगल शासक औरंगजेब की मृत्यु के बाद सहज ही परिलक्षित होने लगा था। उच्चवर्ती मुगल शासकों द्वारा तत्कालीन यूरोपीय व्यापारियों को दी गई उदारतापूर्वक रियायतों ने स्वदेशी व्यापारियों के हितों को नुकसान पहुंचाया। साथ ही व्यापार और वाणिज्यिक व्यवस्था भी कमजोर पड़ती गई। ऐसी स्थिति में यहां की घरेलू अर्थव्यवस्था […]

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भारतीय रिजर्व बैंक

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की स्थापना वर्ष 1935 में (RBI Act, 1934) एक निजी बैंक के रूप में की गई थी। इसे सामान्य व्यवसाय बैंकिंग व्यवसाय के साथ अन्य दो कार्य – भारत में विद्यमान बैंकों का नियमन तथा नियंत्रण करना एवम सरकार के बैंक की भूमिका निभाना भी दिए गए थे। भारत सरकार द्वारा […]

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कोरोना और सेवा

आज की तारीख में जहां हमारे देश में कोरोना के कारण हालात बद से बत्तर स्थिति में है और देश एक बहुत ही बड़े संकट से जूझ रहा है एवम लाचार से देश के हालात है। वहीं हमारे देश की कुछ NGO और कुछ अन्य संगठन आगे आकर मानवता के हित की रक्षा कर रहे […]

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