पंथनिरपेक्ष

भारतीय संविधान एवं भारतीय राजव्यवस्था राज्य लोक सेवा आयोग

पंथनिरपेक्षता शब्द को जॉर्ज जैकब होलिओक ने 1851 में दिया था जो ब्रिटेन का धर्मनिरपेक्षतावादी था। पंथनिरपेक्षता की अवधारणा की शुरुआत फ्रांस से होती है।

*भारत में सबसे पहले राणिजीत सिंह के पंथनिरपेक्ष राज्य की स्थापना पंजाब में 19 वी सदी के पूर्वार्द्ध में की।

धर्म :-

i) धर्म विरोधी (चीन)साम्यवादी वामपंथी

ii) धर्म तंत्रीय (धर्म) शासन सरकार

iii) धर्म निरपेक्ष

धर्म के आधार पर राज्य 3 प्रकार के होते है –

  1. धर्म विरोधी :- ऐसे राज्यों में धर्म का कोई स्थान नहीं होता है और न ही राज्य धर्म को मान्यता देता है। जैसे चीन या अन्य साम्यवादी देश।
  2. धर्म तंत्रीय :- ऐसे राज्य में सरकारी तंत्र भी एक धर्म होता है और सरकार का संचालन धार्मिक मान्यता के अनुसार ही होता है। जैसे वेटिकन सिटी, सऊदी अरब इत्यादि।
  3. धर्म निरपेक्ष :- धर्म निरपेक्षता से आशय है कि –

i) राज्य का अपना कोई शासकीय या राजकीय धर्म नहीं होगा अर्थात राज्य धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संचालित नहीं होगा।

ii) राज्य अपने नागरिकों के बीच सेवाओं और सुविधाओं को उपलब्ध कराने के दौरान या अपनी नीतियों और कार्यक्रमों का निर्माण एवं क्रियान्वयन करने के दौरान धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा।

iii) राज्य सभी धर्म के अनुयायियों को सामान रूप से संरक्षण, महत्व और प्रोत्साहन प्र्रदान करेगा तथा किसी धर्म के बीच कोई भेदभाव नहीं करेगा।

iv) सभी धर्म के अनुयायियों को धर्म कि स्वतंत्रता का अधिकारप्राप्त होगा।

क्या भारत धर्मनिरपेक्ष है :- सैद्धांतिक दृष्टि से भारत धर्मनिरपेक्ष है क्युंकि –

a) भारत में राज्य का कोई धर्म नहीं है

b) भारत में संविधान सर्वोच्च है न कि कोई धर्म ग्रन्थ

c) अनुच्छेद 15 में अन्य आधारों के साथ-साथ धर्म के आधार पर भेदभाव कि मनाही कि गयी है।

d) मूल अधिकारों के अंतर्गत अनुच्छेद 25 से 28 के बीच सभी व्यक्तियों को धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है।

e) 1994 में S R बोम्मई वाद में सुप्रीम कोर्ट ने पंथनिरपेक्षता को संविधान का आधारभूत ढांचा माना है।

f) जनवरी 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा की भारत की निर्वाचन व्यवस्था एक पंथ निरपेक्ष प्रक्रिया है। अतः धर्म के आधार पर वोट देंने की अपील करना जान प्रतिनिधित्व 1951 के तहत धारा 123 (3) के तहत भ्रष्ट आचरण माना जायेगा

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