2. क्षेत्रीय शक्तियों का उदय

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2.1 पृष्ठभूमि

  • 1761 तक , मुगल साम्राज्य केवल नाम मात्र के लिए साम्राज्य रह गया था, क्योंकि इसकी कमजोरियों ने स्थानीय शक्तियों को स्वतंत्र होने का अवसर प्रदान किया।फिर भी , मुगल सम्राट की प्रतीकात्मक सत्ता बनी रही, क्योंकि उन्हें अभी भी राजनीतिक वैधता का स्त्रोत माना जाता था।
  • नए राज्यों ने प्रत्यक्ष रुप से मुगल अधिकार को चुनौती नहीं दी तथा अपने शासन को वैधता प्रदान करने हेतु लगातार उनका अनुमोदन प्राप्त करते रहे। इसलिए 18वीं शताब्दी में इन राज्यों के उद्भव ने राजनीतिक पतन के बजाय एक परिवर्तन का प्रतिनिधित्व किया इसने शक्ति शून्यता अथवा राजनीतिक अराजकता की स्थिति को उत्पन्न करने के बजाय शक्ति का विकेंद्रीकरण किया।
  • बंगाल, अवध और हैदराबाद जैसे कुछ राज्यों को “उत्तराधिकार राज्य” रूप में देखा जा सकता है, सरदार, जमींदार और किसानों द्वारा किए गए बिद्रोहो से उत्पन्न हुए थे इन्हें विद्रोही राज्य की संज्ञा दी गई यह राज्य राजनीतिक और स्थानीय पपरिस्थितियों में एक-दूसरे से काफी भिन्न थे।
  • उत्तराधिकारी राज्यों और विद्रोही राज्यों के अतिरिक्त, राजपूत क्षेत्रों, मैसूर और त्रावणकोर जैसी कुछ रियासतें भी थी, जो पहले से ही बहुत स्वायत्त थी और अब 18 वीं सदी में पूरी तरह से स्वतंत्र हो गई थी।
  • 2.2.1 बंगाल
  • 1717 में बंगाल में मुर्शिद कुली खां की नियुक्ति इस सूबे की स्वायत्तता का वाहक बनी ।इसे औरंगजेब द्वारा प्रारंभ में राजस्व प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त बनाने के लिए बंगाल का दीवान नियुक्त किया गया था।
  • तत्पश्चात 1710 में 2 साल के छोटे अंतराल के बाद बहादुर शाह ने उसे उसी पद पर पुनः नियुक्त किया।अब फर्रूखसियर बादशाह बना तो उसने इस पद पर मुर्शिद कुली खां की नियुक्ति को स्थाई कर दिया और साथ ही उसे बंगाल का नायाब सूबेदार और उड़ीसा का सूबेदार भी बना दिया।
  • आगे चलकर 1717 से उसे जब बंगाल का नाजिम सूबेदार बना दिया गया तो उसे एक ही साथ नाजिम और दीवान जैसे दो पद संभालने का अभूतपूर्व विशेषाधिकार मिल गया।नियंत्रण और संतुलन की जिस व्यवस्था द्वारा साम्राज्य इन दोनों अधिकारियों को अंकुश में रखने के लिए पूरे मुगल काल में शक्ति का जो विभाजन जारी रखा गया था उसी को अब इस तरह समाप्त कर दिया गया।
  • इससे मुर्शिद कुली खां,जो अपने राजस्व प्रशासन के लिए जाना जाता था को अपनी स्थिति को और मजबूत करने में सहायता मिली इस प्रकार उसने औपचारिक रूप से मुगलों की सत्ता की अवज्ञा नहीं की तथा सदैव शाही खजाने को राजस्व भेजता रहा।
  • मुर्शीद कुली ने अपने प्रत्येक राजस्व दाई क्षेत्र का एक विस्तृत सर्वेक्षण कराने के लिए अपने अन्वेषक भेजें तथा जमींदारों को समय पर पूर्ण राजस्व चुकाने हेतु विवश किया।
  • इसके लिए उसने छोटी-छोटी कुप्रबंध जमींदारियों के स्थान पर अपेक्षाकृत कम शक्तिशाली जमीनधारियों के विकास को बढ़ावा दिया जब की शोषणकारी जमींदारों को दंडित किया गया। साथ ही कुछ जमींदारों को दंडित किया गया साथ ही प्रांत उड़ीसा भेजकर उनकी जागीर को खालसा शाही भूमि में परिवर्तित कर दिया गया।
  • इस प्रकार 1717 से 1726 तक के काल में कम संख्या में बड़े भूमि पतियों का उदय हुआ यह भूपति समय पर मालगुजारी की वसूली में नाजिम की सहायता करते थे इन्होंने उसके संरक्षण में अपनी संपत्तियों को भी बढ़ाया।

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