मुद्रा (Money)

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*कागजी मुद्रा का इतिहास और मुद्रा सृजन प्रकिया

.यघपि सोने और चांदी जैसी मूल्यवान धातुआो ने कई वर्षो तक भली भाती प्रकार से मुद्रा के अपेक्षित कार्यो की पूर्ति की तथा साथ ही भौतिक
उत्पादकों को एक साथ स्थान से दूसरे स्थान ले जाने की तुलना में सोने के सिक्के से जाना सरल भी होता था परन्तु कई सामने से यह व्यापर संचालित करने का सुरछित तरीका नहीं था

मुद्रा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण विकास वचन -पत्र यथार्थ प्रामिसरी नोट था यह प्रक्रिया तब आरम्भ हुई जब लोग स्वर्डकारो के पास अपना
अतिरिक्त सोना रखने लगे। वे लोगो के जमा सोने की अपने पास रखते थे। बदले में स्वर्डकार जमाकर्ताओं को एक रशीद देते थे। रशीद में यह उल्लेख होता था की उन्होंने कितना सोना जमा किया है।अतः वस्तुआो के क्रेताओं दवारा वस्तुओ के विक्रेताओं को सोने का भौतिक हस्तातरड़
किये जाने की वजय वस्तुओ और सेवाओं के बदले इन राशिदो का सीधे व्यापर (लेंन -देंन) किया जाने लगा।

क्रेता और विक्रेता ,दोनों को स्वर्डकार पर विश्वाश करना पड़ता था क्युकी सारा सोना स्वर्डकार के पास जमा होता था और स्वर्डकार ग्राहकों के पास केवल कागज की एक रशीद होती थी। ये जमा रशीदें ,लोगो की मांग पर सोने की एक निश्चित मात्रा का भुगतान करने के वादे का प्रतिक होती थी। इसलिए ये कागजी मुद्राय उन मूल्यांकन धातुओं की प्रतिनिधि बन गई।

लोगो का सोना जमा करने और बदले में जमा रशीद तथा आआए चलकर वचन पत्र जारी करने की प्रक्रिया में स्वर्डकारो और प्राम्भिक बैंको को यह लगने लगा की उनकी तिजोरी में रखा सोना किसी एक समय पर आहरित महि होता है। दूसरी और लोग वचन पत्रों से वस्तुए एवं सेवाय खरीदते और बेचते थे। लेकिन वचन पत्रों से शीघ्र प्राप्त होने वाला अधिकांश सोना तिजोरी में पड़ा रहता था

अर्थव्यवस्था में मुद्रा की भूमिका को समझने के लिए मुद्रा सृजन की प्रक्रिया को समझना मह्त्वपूर्ड है इसकी प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है की अपने ग्रहको दवारा की जाने वाली निकासी को बाधारहित बनाने के लिए बैंको ने कितनी धनराशि आरक्षित राखी है। इस धारड़ा
के आधार पर की सभी ग्राहक किसी एक समय पर अपनी समपृर्ड धनराशि की निकाशी महि करेंगे
ग्राहकों का पैसा दुसरो को उधार देने की परिपाटी को आंशिक आरक्षित बैंकिग कहा जाता है।

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