3. नियोजन प्रक्रिया में प्रयुक्त मॉडल (Models used in the Planning Process)

Indian economy भारतीय अर्थव्यवस्था राज्य लोक सेवा आयोग संघ लोक सेवा आयोग

3.1 हैरोड-डोमर विकास मॉडल

  1. हैरोड और डोमर ने निवेश एवम मांग की गतिशील प्रकृति का विश्लेषण किया तथा यह प्रदर्शित किया कि किस प्रकार पूंजी तथा मांग में भिन्नताएं आर्थिक वृद्धि में अस्थिरता हेतु उत्तरदायी थीं।
  2. आर्थिक विकास के मुख्य निर्धारक है : प्राकृतिक संसाधन, तकनीकी प्रगति, जनसंख्या वृद्धि इत्यादि। आर्थिक विकास के ये निर्धारक निम्नलिखित दो महत्वपूर्ण कारकों पर प्रभाव डालकर अंततः विकास दर को प्रभावित करते है :

i) निवेश की दर

ii) कैपिटल-आउटपुट रेशियो (पूंजी-उत्पाद अनुपात)

3. इस प्रकार किसी देश के आर्थिक विकास की दर निवेश की दर और कैपिटल आउटपुट रेशियो पर निर्भर करती है। अतः हैरोड और डोमर के अनुसार,

विकास दर = निवेश (1/ कैपिटल आउटपुट रेशियो)

3.1.1 विकासशील देशों के लिए हैरोड डोमर-मॉडल की प्रासंगिकता :

  1. हैरोड-डोमर मॉडल मुख्यतः विकसित देशों को दीर्घकालिक बेरोजगारी से संरक्षण प्रदान करने के लिए विकसित किया गया था। इसका उद्देश्य विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को उनके आर्थिक विकास हेतु दिशा-निर्देश प्रदान करना नहीं था। यह बचत की उच्च प्रवृत्ति और कैपिटल-आउटपुट रेश्यो (COR) के सही आकलन पर आधारित था जिसे समय के साथ स्थिर रहना चाहिए।
  2. दूसरी ओर, अल्प-विकसित देशों की मुख्य समस्या उनकी बचत की प्रवृत्ति को बढ़ाना है क्योंकि सामान्यतः इन देशों में बचत दर कम होती है। इसके अतिरिक्त इन देशों में कैपिटल-आउटपुट रेशियो के एक स्थिर मान का आकलन भी संभव नहीं है। इन देशों में COR बहुत अधिक होता है। इस प्रकार, हैराड-डोमर मॉडल के दो महत्वपूर्ण आधार विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के संदर्भ में लागू नही होते हैं।
  3. इसके अतिरिक्त विकाशील देशों में बेरोजगारी की समस्या की प्रकृति विकसित देशों से भिन्न है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में मांग की कमी के कारण चक्रीय बेरोजगारी पाई जाती है तो वही विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में प्रच्छन्न बेरोजगारी पाई जाती है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में, निवेश के स्तर में वृद्धि कर बेरोजगारी को समाप्त किया जा सकता है। इसे सकल मांग (जो उत्पादक क्षमता में वृद्धि के अनुरूप नहीं थी) में वृद्धि होती है। विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में, बेरोजगारी इसलिए है क्योंकि वहां उपलब्ध उत्पादक क्षमता, मौजूद समग्र कार्यबल को रोजगार प्रदान करने हेतु अपर्याप्त है। इस प्रकार इन देशों में, निवेश का उद्देश्य कुल मांग के बजाय उत्पादक क्षमता को बढ़ाना और मौजूदा निष्क्रिय क्षमता का पूर्ण उपयोग करना है।
  4. इस प्रकार विकासशील देशों में व्याप्त विशिष्ट आर्थिक परिस्थितियां जैसे प्रच्छन बेरोजगारी, कम बचत की प्रवृत्ति और निम्न उत्पादक क्षमता हैरोड-डोमर मॉडल को इन देशों के लिए अनुपयुक्त बनाती हैं। इसके अतिरिक्त, इस मॉडल के लिए सरकारी हस्तक्षेप और संस्थागत परिवर्तन की आवश्यकता नहीं होती और साथ ही एक शर्त यह भी है कि कीमतें। स्थिर होनी चाहिए। अतः ये सभी अवधारणाएं भी इसे अनुपयुक्त बना देती हैं।
  5. हालांकि, हमे इस मॉडल को पूर्णतः अस्वीकार नहीं करना चाहिए बल्कि इसे विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के अनुकूल बनाने पर ध्यान देना चाहिए। कुछ संसोधनो तथा पुनः व्याख्या के द्वारा इस मॉडल को विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी उपयुक्त दिशा-निर्देश प्रदान करने योग्य बनाया जा सकता है।
  6. कुछ मामलों में, केवल प्राथमिकता को बदल कर इस मॉडल को विकासशील देशों के अनुकूल बनाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, डोमर मॉडल क्षमता निर्माण में निवेश के महत्व को स्वीकारता है परंतु विकसित देशों में इस प्रकार के निवेश का प्रयोजन प्रभावी मांग को बढ़ाना है। वहीं विकासशील देशों में, क्षमता निर्माण में निवेश की भूमिका को बेरोजगारी की समस्या को दूर करने के एक साधन के रूप में देखा जाना चाहिए। इस प्रकार, इस मॉडल को विकासशील देशों के अनुकूल बनाने के लिए इसे

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