3.3 आर्थिक विकास की महालनोबिस रणनीति

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  1. हमारे देश में नियोजित आर्थिक विकास के लिए अपनाई जाने वाली उचित रणनीति को लेकर मतभेद की स्थिति रही है। ऐसे में पहली पंचवर्षीय योजना बिना किसी स्पष्ट रणनीति के समाप्त हो गई। हालांकि दूसरी योजना के दौरान प्रो. पी.सी. महलानोबिस ने एक विकास मॉडल तैयार किया। इस मॉडल में उन्होंने दर्शाया कि भारत को तीव्र गति से आत्मनिर्भर विकास प्राप्त करने के लिए, विकास परिव्यय का एक प्रमुख भाग आधारभूत भारी उद्योगों के निर्माण में लगाना चाहिए। इन भारी उद्योगों में पूंजीगत वस्तुओ से संबंधित उद्योग जैसे इस्पात, विभिन्न प्रकार की मशीनों के निर्माण हेतु इंजीनियरिंग उद्योग तथा विद्युत एवम सिंचाई हेतु बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएं सम्मिलित थी।
  2. प्रो. महालनोबिस के अनुसार, भारत जैसे देश में वास्तविक पूंजी निर्माण की दर केवल धन के रूप में की जाने वाली बचतों पर निर्भर नहीं है अपितु यह पूंजीगत वस्तुओ के निर्माण की क्षमता पर निर्भर करती है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि बचत की दर वास्तव में बढ़ जाए और उपभोक्ता वस्तु संबधी उद्योगों में इसके निवेश द्वारा पूंजी निर्माण और आर्थिक विकास की गति को तीव्र करने का प्रयास भी किया जाए तो यह प्रयास निरर्थक ही होगा। इसका कारण यह है कि उपभोक्ता वस्तु संबंधी उद्योगों के लिए आवश्यक पूंजीगत वस्तुओ का देश में पर्याप्त मात्रा में उत्पादन नही किया जाता है।
  3. इस प्रकार प्रो. महालनोबिस का मानना था कि यदि आधारभूत भारी उद्योगों और पूंजीगत वस्तु संबंधी उद्योगों में अधिक निवेश नहीं किया जाता तो देश आर्थिक विकास और वास्तविक पूंजी निर्माण हेतु सदैव के लिए विदेशों से इस्पात और पूंजीगत वस्तुओ के आयात पर निर्भर हो जाएगा। चूंकि भारत निर्यात में वृद्धि कर इस उद्देश्य के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा प्राप्त नहीं कर सकता अतः विदेशी मुद्रा की अपर्याप्तता के कारण पर्याप्त पूंजीगत वस्तुओं का आयात नहीं किया जा सकता है। इसके परिणामस्वरूप देश का आर्थिक विकास और वास्तविक पूंजी निर्माण की दर वास्तव में मंद हो जायेगी। इस प्रकार उनके अनुसार, तीव्र आर्थिक विकास एवम आत्मनिर्भरता की प्राप्ति हेतु, योजनागत विकास की रणनीति में आधारभूत और पूंजीगत वस्तु से संबंधित उद्योगों को उच्च प्राथमिकता देना आवश्यक होगा।

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