नियमवाद और परिणामवाद आधारित निर्णय

नीतिशास्त्र

किसी भी नैतिक कर्म के निर्धारण के लिए नियम और परिणामवाद का भी सहारा लिया जा सकता है।

नियमवादियों का मानना है की यदि व्यक्ति नियमों के अनुसार कर्म कर रहा है भले ही उसका परिणाम या प्रभाव नकारात्मक हो तो वो कर्म नैतिक माना जाएगा। परन्तु ठीक इसके विपरीत यदि भले ही नियम का पालन किया जाए या न किया जाए परिणाम या प्रभाव सकारात्मक होना ही नैतिक कर्म कहलाएगा। नियमवादी नैतिकता के निर्धारक के रूप में जहां नियम और कानून पर बल देते है, वहीं परिणामवादी व्यक्ति की भावनाओं पर बल देते है। परन्तु इन दोनो की अपनी-अपनी सीमाएं है। कोई आवश्यक नही की नियमों के आधार पर लिया गया निर्णय सही हो क्योंकि प्रत्येक समस्या और स्थिति नियम और तथ्यों से ही परिभाषित भी होती है कुछ भावनात्मक पहलू भी महत्वपूर्ण होते है।

उदाहरण के लिए महाभारत में भीष्म द्वारा ली गई प्रतिज्ञा के अनुरूप द्रोपदी के चीरहरण के दौरान भी मूकदर्शक बने रहना नियमवाद की सीमाओं का परिचायक है। ठीक इसके विपरीत कर्ण द्वारा अपनी कुंठा की संतुष्टि के लिए दुर्योधन का सहयोग देकर धर्म के विरुद्ध खड़े होना परिणामवाद की सीमाओं को चिन्हित करता है।

इस प्रकार नैतिकता के निर्धारक तत्व के रूप में मध्यम मार्ग या common ethics का सहारा लेना चाहिए। सदैव व्यक्ति को कर्म करने के दौरान नियम व मानदंडों को ध्यान में रखते हुए सकारात्मक प्रकृति की भावनाओं के प्रति जो समाज में सर्वस्वीकृत है के अनुसार कर्म करने के लिए प्रेरित होना चाहिए। परन्तु कर्म के दौरान किसी भी समस्या का समाधान नियम व मानदंडों के अनुसार ही करना चाहिए।

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