2. आर्थिक विकास (Economic Development)

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  1. यद्यपि कुछ विशेषज्ञों द्वारा आर्थिक विकास को आर्थिक संवृद्धि और आर्थिक प्रगति से भिन्न अर्थों में परिभाषित किया जाता है, तथापि इस विषय की समझ विकसित करने हेतु हम इन शब्दों को समानार्थी मान सकते है। इस प्रकार हम आर्थिक विकास की परिभाषा को प्रति व्यक्ति आय पर आधारित कर सकते हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि आर्थिक विकास देश में स्थिर कीमतों पर प्रति व्यक्ति आय में निरंतर वृद्धि को प्रदर्शित करता है। उच्च प्रति व्यक्ति आय का अर्थ होगा कि लोग संपन्न है एवम अपेक्षाकृत उच्च स्तर का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इसके साथ ही आर्थिक विकास का मुख्य उद्देश्य लोगों के जीवन स्तर में वृद्धि करना भी है। इसके अतिरिक्त आर्थिक विकास की स्थिति में राष्ट्रीय आय में दीर्घकालिक वृद्धि होनी चाहिए। एक अस्थाई या अल्पकालिक वृद्धि वास्तविक आर्थिक विकास को प्रदर्शित नहीं करती / आय में होने वाली यह वृद्धि बड़ी बचतों को प्रोत्साहित करने, पूंजी निर्माण में वृद्धि करने और तकनीकी विकास में सहायक होती है /

2.1 रोस्तोव द्वारा वर्णित आर्थिक विकास के विभिन्न चरण (Rostow’s Stages of Economic Development)

रोस्तोव ने मुक्त व्यापर एवं मुक्त बाजार पूंजीवाद की प्रभावोत्पादकता पर बल दिया / उन्होंने आर्थिक विकास की ऐतिहासिक प्रक्रिया को निम्नलिखित चरणों में वर्गीकृत किया है :

2.1.1 परंपरागत समाज

  1. निर्वाह (Subsistence) अर्थव्यवस्था
  2. सीमित प्रौद्योगिकी

2.1.2 ‘टेक ऑफ’ से पूर्व की परिस्थितियां – प्रारंभिक चरण

  1. विज्ञान, जोखिम उठाने की प्रवृत्ति और लाभ अर्जन के सम्बन्ध में समाज के दृष्टिकोण में परिवर्तन
  2. श्रम बल की अनुकूलनशीलता
  3. राजनीतिक सम्प्रभुता
  4. एक केंद्रीयकृत कर प्रणाली और वित्तीय संस्थानों का विकास; तथा
  5. रेल मार्गों, सड़कों और शैक्षणिक संस्थानों जैसी कुछ आर्थिक और सामाजिक संरचनाओं का निर्माण

2.1.3 “टेक ऑफ” अवस्था (The Take of Stage)

  1. अर्थव्यवस्था स्वयं को इस प्रकार परिवर्तित करती है कि आर्थिक संवृद्धि लगभग स्वचालित रूप से होने लगती है /
  2. निवेश दर में वृद्धि प्रति व्यक्ति वास्तविक उत्पादन में वृद्धि को प्रेरित करती है / यह प्रारंभिक वृद्धि उत्पादन की तकनीकों एवं आय प्रवाह की प्रकृति में आमूल-चूल परिवर्तन लाती है और अंततः निवेश के नए स्तर को स्थापित करती है /
  3. यह अवस्था निम्नलिखित तीन स्थितियों की द्वोतक है :

i) राष्ट्रीय आय और निवेश का अनुपात संभावित जनसँख्या वृद्धि से अधिक हो जाता है /

ii) टेक ऑफ अवस्था की अवधि अपेक्षाकृत छोटी होनी चाहिए ताकि यह आर्थिक क्रांति की विशेषताओं को प्रदर्शित कर सके /

iii) यह स्व-निर्भर एवं स्वतः उत्पादनशील आर्थिक संवृद्धि के साथ समाप्त नहीं होनी चाहिए /

2.1.4 परिपक्वता की दिशा में आगे बढ़ना – स्व-निर्भर संवृद्धि की अवधि

  1. बचत और निवेश की दर इस स्तर पर पहुँच जाती है कि आर्थिक संवृद्धि स्वचालित होती है /
  2. अर्थव्यवस्था की परिपक्वता के साथ ही सकल प्रतिव्यक्ति पूंजी में भी वृद्धि होती है /
  3. अर्थव्यवस्था की संरचना में उत्तरोत्तर वृद्धि होती है /
  4. आरंभिक प्रमुख उद्योग जिन्होंने ‘टेक ऑफ ‘ अवस्था को आरम्भ किया, वे प्रतिफल (Return) में ह्रास कि प्रवत्ति दर्शाने लगते हैं/ परन्तु तीव्रता से बढ़ते नए क्षेत्रों के कारन वृद्धि की औसत दर बानी रहती है /

2.1.5 उच्च उपभोग की अवस्था :

  1. उद्योग अर्थव्यवस्था आधार बन जाते है /
  2. उच्च मूल्य वाली उपभोक्ता वस्तुओं की व्यापक खपत होती है /

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