अध्याय 1 : राष्ट्र निर्माण और एकीकरण : प्रक्रिया और चुनौतियां

परिचय : 15 अगस्त 1947 को भारत में अंग्रेजी साम्राज्य का अंत हो गया तथा भारत ने स्वतंत्रता प्राप्ति की। हालांकि यह स्वतंत्रता देश के विभाजन के कीमत पर प्राप्त हुई थी। नवजात राष्ट्र का एक बहुत बड़ा हिस्सा सांप्रदायिक दंगों की चपेट में था। 2 नए देशों की सीमाओं के आर-पार विशाल जनसमूह का […]

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लोकतांत्रिक

इसका अर्थ है कि भारतीय राज्य व्यवस्था शासन के जिस प्रकार को स्वीकार करती है वह लोकतंत्र है, ना कि राजतंत्र, अधिनायकतंत्र या कुछ और। इसका अर्थ है कि भारत का शासन भारत की जनता द्वारा ही चलाया जाता है। जो कि भारत का क्षेत्रफल और जनसंख्या बहुत अधिक है स्वभाविक है क्या प्रत्यक्ष लोकतंत्र […]

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भारतीय राजव्यवस्था की प्रकृति का परिचय

प्रस्तावना बताती है कि भारतीय राजव्यवस्था की प्रकृति क्या है? इसे स्पष्ट करने के लिए प्रस्तावना के निम्नलिखित 5 शब्द विशेष महत्व के हैं : संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न: इसका अर्थ है कि भारत अपने आंतरिक और विदेश संबंधी मामलों में कोई भी स्वतंत्र निर्णय लेने की ताकत रखता है वह किसी भी अन्य विदेशी सत्ता […]

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भारत परिषद अधिनियम 1892

1857 में हुई राज्य क्रांति तथा शिक्षा के प्रसार ने भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना को सुदृढ़ किया। 1885 में कांग्रेस की स्थापना तथा इलवर्ट बिल विवाद के पश्चात भारतीयों को प्रशासन तथा विधि निर्माण में और अधिक प्रतिनिधित्व देने के मांग ने काफी जोर पकड़ लिया, जिसके फलस्वरूप यह अधिनियम पारित किया गया। प्रावधान […]

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भारत परिषद अधिनियम 1861 (The Indian council Act, 1861)

1861 का यह कानून भारत के संवैधानिक विकास में एक महत्वपूर्ण कदम था। इस कानून से अंग्रेजों की वह नीति आरंभ हुई जिसे सहयोग की नीति ( Policy of Association) या उदार निरंकुशता (Benevolent Despotism) का नाम दिया गया क्योंकि इसके द्वारा सर्वप्रथम भारतीयों को शासन में सम्मिलित करने का प्रयत्न किया गया था। 1858 […]

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ब्रिटिश क्राउन के आधीन संवैधानिक विकास

भारत सरकार अधिनियम 1858 : पिट्स इंडिया एक्ट द्वारा स्थापित बोर्ड ऑफ कंट्रोल (Board of Control) कंपनी के ऊपर अपना नियंत्रण नहीं रख सका। भारत में कंपनी एक गैर जिम्मेदार सरकार की तरह कार्य करती रही जिसके कारण 1857 की क्रांति हुई। फलस्वरूप तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉर्ड पामस्टर्न ने 12 फरवरी, 1858 ई. को भारत […]

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1853 का चार्टर एक्ट

1853 का चार्टर अधिनियम भारतीयों द्वारा कंपनी के प्रतिक्रियावादी शासन के समाप्ति की मांग तथा गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी द्वारा कंपनी के शासन में सुधार हेतू प्रस्तुत रिपोर्ट के संदर्भ में पारित किया गया था। इस अधिनियम की निम्नलिखित विशेषताएं थी – इस अधिनियम के द्वारा सिविल सेवकों की भर्ती एवम चयन हेतु खुली प्रतियोगिता […]

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1833 का चार्टर एक्ट

1813 के चार्टर अधिनियम के पश्चात, भारत में कंपनी के साम्राज्य में काफी वृद्धि हुई, जिस पर समुचित नियंत्रण स्थापित करने के लिए ब्रिटिश संसद ने 1814, 1823 तथा 1829 में अधिनियम द्वारा कंपनी को कुछ अधिकार प्रदान किया , किंतु ये अधिनियम वांछित सफलता न दे सके। अतः 1833 में चार्टर अधिनियम पारित किया […]

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1813 का चार्टर एक्ट (Charter Act of 1813)

कंपनी के एकाधिकार को समाप्त करने, उस पर और प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने तथा ईसाई मिशनरियों कि भारत में और अधिक स्वायत्ता की मांग के मद्देनजर यह राजलेख पारित किया गया था जिसके अंतर्गत निम्न प्रावधान किए गए थे- कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार अगले 20 वर्षों के लिए पुनः बढ़ा दिया गया। इसके द्वारा कंपनी […]

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1786 का अधिनियम (Act of 1786)

इस अधिनियम के द्वारा गवर्नर जनरल को विशेष परिस्थिति में अपने परिषद के निर्णयों को निरस्त कर अपने निर्णयों को लागू करने का अधिकार प्रदान किया गया और साथ ही गवर्नर जनरल को प्रधान सेनापति की शक्तियां भी प्रदान की गई। लॉर्ड कॉर्नवालिस गवर्नर जनरल और मुख्य सेनापति की शक्ति को एक ही व्यक्ति के […]

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