लोकतांत्रिक

इसका अर्थ है कि भारतीय राज्य व्यवस्था शासन के जिस प्रकार को स्वीकार करती है वह लोकतंत्र है, ना कि राजतंत्र, अधिनायकतंत्र या कुछ और। इसका अर्थ है कि भारत का शासन भारत की जनता द्वारा ही चलाया जाता है। जो कि भारत का क्षेत्रफल और जनसंख्या बहुत अधिक है स्वभाविक है क्या प्रत्यक्ष लोकतंत्र […]

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पंथनिरपेक्ष

पंथ निरपेक्ष राज्य तीन तरह के राज्यों से अलग होता है। प्रथमतः वह भूतपूर्व सोवियत संघ जैसे उन साम्यवादी राज्यों से अलग होता है जो धर्म विरोधी होते हैं और अपने नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार नहीं देते। दूसरे वह वेटिकन सिटी जैसे उन धर्म 3 राज्यों से अलग होता है जिनमें धर्म का […]

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भारतीय राजव्यवस्था की प्रकृति का परिचय

प्रस्तावना बताती है कि भारतीय राजव्यवस्था की प्रकृति क्या है? इसे स्पष्ट करने के लिए प्रस्तावना के निम्नलिखित 5 शब्द विशेष महत्व के हैं : संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न: इसका अर्थ है कि भारत अपने आंतरिक और विदेश संबंधी मामलों में कोई भी स्वतंत्र निर्णय लेने की ताकत रखता है वह किसी भी अन्य विदेशी सत्ता […]

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संविधान के स्त्रोत का परिचय

प्रस्तावना बताती है कि संविधान के स्त्रोत भारत के लोग अर्थात भारत की जनता है। प्रस्तावना की शुरुआत में ही प्रयुक्त वाक्यांश ‘हम भारत के लोग’ इस प्रयोजन की पूर्ति करता हैं यह वाक्यांश भारतीय राजव्यवस्था के लोकतांत्रिक पक्ष को भी प्रस्तुत करता है। ध्यातव्य है कि इस बात पर कुछ विवाद है कि क्या […]

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हेनले पासपोर्ट इंडेक्स 2021

हाल ही में लंदन स्थित ‘हेनले एंड पासपोर्ट’ ने हेलने पासपोर्ट इंडेक्स 2021 जारी किया। भारत को 90वे पायदान पर जगह मिली है। भारत की रैंकिंग में 6 स्थानों की गिरावट आई है, पिछले साल भारत को 84वे स्थान पर जगह मिली थी। भारत के पासपोर्ट के साथ 58 देशों में वीजा फ्री यात्रा की […]

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1.2 समाजवाद

समाजवाद का आंसर समाज के एक आर्थिक संगठन से है जिसमें उत्पादन के भौतिक साधन पर संपूर्ण समुदाय का स्वामित्व होता है यह आर्थिक संगठन समुदाय के प्रति उत्तरदाई होता है एवं उनके प्रतिनिधि निकायों द्वारा संचालित होते हैं समान अधिकारों के आधार पर समुदाय के सभी सदस्यों को इस प्रकार के सामाजिक योजनाबद्ध उत्पादन […]

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1. आर्थिक प्रणालियां

वर्तमान में किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को पूर्णतः पूंजीवादी अर्थव्यवस्था अथवा पूर्णता समाजवादी अर्थव्यवस्था की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता हालांकि वर्गीकरण के उद्देश्य विभिन्न आर्थिक प्रणाली को निम्नलिखित वर्गों में विभक्त किया जा सकता है – 1.1 पूंजीवाद पूंजीवाद के अंतर्गत सभी कृषि क्षेत्रों कारखानों एवं उत्पादन के अन्य साधनों पर निजी […]

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विकास ले लिए ज्ञान

विगत 5 दशकों में एशिया के दिन अग्रणी देशों ने ज्ञानार्जन तथा ज्ञान सृजन में निवेश उन्होंने अन्य देशों के मुकाबले अधिक तेजी से प्रगति की ओर उनके अनुभवों से यह सीखना जरूरी है कि हमें ज्ञान का सृजन अर्जुन संयोजन तथा प्रसार में निवेश करना चाहिए ताकि सामाजिक स्थितियों में सुधार और आर्थिक गतिविधियां […]

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ज्ञान अर्थव्यवस्था के रूप में भारत

उदीयमान ज्ञान अर्थव्यवस्था में भारत को बड़ी संख्या में उच्च क्षमता युक्त मानव संसाधन की आवश्यकता होगी हमारी सबसे बड़ी ताकत उस स्त्री कौशल की उपलब्धता है सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हमें कक्षा आधिकारिक स्वीकृति हासिल हो रही है भारत में प्रतिस्पर्धी यों को पकड़ने में सफल रहे लेकिन इस स्थिति को बनाए रखने […]

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ज्ञान अर्थव्यवस्था

डिजिटल क्रांति में मनुष्य के लिए अवसरों के नए द्वार खोल दिए हैं जिसकी बदौलत ज्ञान अर्थव्यवस्था के तहत व्यक्ति समृद्धि और धन उपार्जन कर सकता है। नई तकनीक ने दुनिया भर में ज्ञान क्रांति के जरिए अंतर निर्भरता का बोध बढ़ाया है जिससे भूमंडलीय अंतर संवाद व्यापक सघन त्वरित तथा प्रभावी हुआ है। विश्व […]

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